ललितपुर

विश्व मानवाधिकार दिवस विशेष

जन्म लेते ही बच्चा मानवोचित जीवन जीने की गारंटी प्राप्त कर लेता है : प्रो.शर्मा

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
ललितपुर। विश्व मानवाधिकार दिवस पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य प्रो.भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि आदमी श्रम करने के लिए नहीं जीता, बल्कि वह सच्चे अर्थों में मनुष्य की भांति जीने के लिए श्रम करता है। मानव प्रकृति की इस प्रकृति में ही उसकी वह दिव्यता, गरिमा निहित होती है, जो उसे जानवर से पृथक कर देती है, क्योंकि जानवर चेतना रहित होता है। मनुष्य श्रमिक है और प्रकृति उसकी सामग्री। धरती, आसमान, आग, पानी की सहायता से, वह अपने आदर्शों के अनुरूप दुनिया को ढालता रहता है। दूसरे महायुद्ध के बाद हुए विनाशकारी परिणाम से सबक लेकर 10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकार आयोग द्वारा प्रस्तुत घोषणापत्र लागू किया गया जिसे स्वतंत्र भारत ने एकमत होकर लागू किया। शिक्षा, रोजगार, लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका गरिमामय जीवन जीने के समस्त मूलअधिकार इसमें सन्निहित हैं। यद्यपि यह सही है कि मनुष्य स्वतंत्र उत्पन्न होता है, परन्तु जन्म लेते ही पर्त दर पर्त बन्धनों से जकड़ता जाता है। अत: मानवाधिकारों का उपभोग करते हुए वह ऊँचे से ऊँची उड़ान भर सकता है। परन्तु आर्थिक आत्मनिर्भरता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता कोरा भ्रम है। कानून के समक्ष सभी समान हैं। क्या बेरोजगार, निर्धन न्यायालयों से न्याय और प्राईवेट चिकित्सालयों से अपना उपचार करा सकता है? जिस वर्ग की अंटी की आखिरी कौड़ी मात्र एकजोर के राशन-पानी में रोज खर्च हो रही हो, उसके बच्चे आसानी से 14 साल तक की मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का लाभ उठा सकते हैं? संसद या विधानमण्डलों में बहुमत होते हुए चुने जा सकते। हाँ जरूर गाँधीजी के रास्ते पर चलकर संगठित सत्याग्रह का विधि-सम्मत मार्ग अपनाकर। जिस प्रकार एक तैलचित्र, तैलकणों का सिर्फ समूह नहीं है बल्कि उससे भी अधिक है, जैसे एक पत्थर की मूर्ति संगमरमर के कणों का मात्र समूह नहीं है। जिस प्रकार एक मनुष्य घटकों तथा रक्त धमनियों का समूह मात्र न होकर उससे भी बहुत कुछ है। अगोचर ब्रह्म को किसने देखा ? पर हाड़-मांस के चलते फिरते गोचर ब्रह्म हमें एक मिनट के लिए भी अकेला छोड़ता। प्रत्येक नवजात शिशु अपार संभावनाएं लेकर धरती पर आता है। इसलिए बड़े जतन से हमें नैसर्गिक मानवाधिकारों के माध्यम से मनुष्य और उसके समूह की गरिमा और महिमा को ठेस नहीं लगने देना चाहिए।
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