25 वर्ष बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं का संकट बरकरार, युवा डीसी की पहल से जग रही नई उम्मीद, हेमन्त सरकार पर भी है भरोसा
25 years on, healthcare crisis persists; initiatives by young DC spark new hope, and confidence in Hemant Singh Sidhu's government

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
पाकुड़। खनिज संपदा से समृद्ध और बिहार काल में आधिकारिक तौर पर जिला घोषित होने के बाद पाकुड़ के निवासियों ने विकास की लंबी प्रतीक्षा के बाद उम्मीद की एक किरण अवश्य महसूस की थी। झारखंड राज्य गठन के बाद लोगों को भरोसा था कि अब जिले की तस्वीर बदलेगी और आधारभूत संरचनाओं में व्यापक सुधार दिखाई देगा। लेकिन झारखंड की रजत जयंती (25 वर्ष) के इस चरण में भी पाकुड़ की स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है।
स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अभी भी पश्चिम बंगाल पर निर्भरता
पाकुड़ जिले की वास्तविकता यह है कि आज भी सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को पश्चिम बंगाल का रुख करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर पर्याप्त चिकित्सकों की अनुपस्थिति और स्वास्थ्य संस्थानों में बुनियादी संसाधनों की भारी कमी के कारण स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार उपेक्षित दिखती है।
डॉक्टरों की भारी कमी, व्यवस्था चरमराई
जिले में कुल 103 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 30 डॉक्टर ही कार्यरत हैं।
2 मेडिकल ऑफिसर लंबे समय से अनुपस्थित हैं, जबकि 3 मेडिकल ऑफिसर ने त्यागपत्र दे दिया है। वही कॉन्ट्रैक्चुअल डॉक्टरों की संख्या मात्र 5 है। हालांकि, हाल ही में जिला प्रशासन ने डीएमएफटी (DMFT) फंड के तहत 11 डॉक्टरों की नई नियुक्ति की है, जिससे आंशिक राहत मिलने की उम्मीद है।
मैनपावर में भी भारी कमी
सूत्रों के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग में (एचआर की बात करे तो) तकरीबन 811 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से लगभग 253 कर्मी ही कार्यरत हैं। यानी 558 पद रिक्त हैं, जो स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति को साफ तौर पर दर्शाता है। वर्षों से रिटायर/ ट्रांसफर होते कर्मचारियों की भरपाई नहीं की गई, जिससे मानव संसाधन में भारी गिरावट आई है।
युवा डीसी मनीष कुमार की पहल से आशा
जिले के युवा उपायुक्त मनीष कुमार ने स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए सक्रिय पहल की है। डीएमएफटी फंड के माध्यम से डॉक्टरों की बहाली कर उन्होंने प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टरों की कमी को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उनकी पहल से मरीजों को स्थानीय स्तर पर कुछ राहत मिलने की उम्मीद जगी है।
कुल मिलाकर तस्वीर अभी भी चिंताजनक
पाकुड़ के स्वास्थ्य तंत्र की दशा यह बताती है कि विगत सरकारों ने इस दिशा में ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए। परिणामस्वरूप, स्वास्थ्य संसाधनों की कमी बढ़ती गई और आम जनता अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित रह गई।
बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं तभी संभव होंगी जब
आवश्यक संख्या में डॉक्टरों की नियुक्ति हो,
स्वीकृत पदों पर मैनपावर की भरपाई की जाए,
स्वास्थ्य संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
फिलहाल, डीसी की नई पहल ने उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन जिले की सम्पूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों की दीर्घकालिक योजनाओं और ठोस हस्तक्षेप की आवश्यकता है। हालांकि वर्तमान हेमन्त सरकार 2.0 भी राज्य वासियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं सुव्यवस्थित कराने में लगे हुए हैं ।



