गोड्डा

रमजान के तीसरे जुमे की नमाज़ बड़े ही एहतराम और अकीदत के साथ पढ़ा गया

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो 

महगामा। इस्लाम धर्म का बरकतों और रहमतों से भरा पवित्र महीना रमजान इन दिनों चल रहा है। शुक्रवार को महगामा प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न मस्जिदों में रमजान के तीसरे जुमे की नमाज़ बड़े ही एहतराम और अकीदत के साथ अदा की गई। नमाज़ के दौरान रोजेदारों ने मुल्क में अमन-चैन, खुशहाली और भाईचारे की दुआ मांगी। रमजान का महीना हर मुसलमान के लिए बेहद खास माना जाता है, जिसमें पूरे 30 दिनों तक रोजा रखकर अल्लाह की इबादत की जाती है।इस्लामी मान्यता के अनुसार रमजान के पूरे महीने को तीन हिस्सों में बांटा गया है, जिन्हें अशरा कहा जाता है। अरबी भाषा में ‘अशरा’ का अर्थ दस होता है। इसी आधार पर रमजान के पहले दस दिन पहला अशरा, दूसरे दस दिन दूसरा अशरा और आखिरी दस दिन तीसरा अशरा कहलाता है। हर अशरे का अपना अलग महत्व बताया गया है।

रमजान का पहला अशरा

पहला अशरा रहमत यानी अल्लाह की दया और कृपा का होता है। इस दौरान रोजा-नमाज करने वालों पर अल्लाह की विशेष रहमत बरसती है। इस अशरे में मुसलमानों को जरूरतमंदों और गरीबों की मदद करने, दान-सदका देने तथा आपसी भाईचारा बढ़ाने की सीख दी जाती है।

रमजान का दूसरा अशरा

दूसरा अशरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का माना जाता है। यह 11वें रोजे से 20वें रोजे तक चलता है। इस दौरान मुसलमान ज्यादा से ज्यादा इबादत कर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। इस्लामी मान्यता के अनुसार इस समय अल्लाह अपने बंदों की तौबा को कबूल कर उन्हें गुनाहों से पाक कर देता है।

रमजान का तीसरा और आखिरी अशरा

21वें रोजे से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे तक चलता है। इसे जहन्नम की आग से निजात का अशरा कहा जाता है और इसे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान मुसलमान अल्लाह से दुआ करते हैं कि उन्हें जहन्नम की आग से महफूज रखा जाए।
रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम पुरुष मस्जिदों में एहतकाफ भी बैठते हैं। एहतकाफ के दौरान लोग दस दिनों तक मस्जिद के एक कोने में रहकर लगातार इबादत, तिलावत और दुआ में मशगूल रहते हैं,जबकि महिलाएं अपने घरों में रहकर इबादत करती हैं। सदका,जकात,अदा करते हैं। रमजान का यह पाक महीना लोगों को सब्र, इंसानियत, भाईचारा और अल्लाह की इबादत का संदेश देता है।

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