ललितपुर

मां की ममता रसोई से लेकर सम्पूर्ण सृष्टि तक पुदीने की तरह महक रही

स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने मातृत्व की महिमा पर रखे विचार

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
ललितपुर। विश्व मातृ दिवस के अवसर पर स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने मातृत्व की महिमा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मां केवल एक सम्बोधन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की सबसे कोमल, करुणामयी और जीवनदायिनी शक्ति है। मां का वात्सल्य केवल घर-आंगन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज, संस्कृति, राष्ट्र और सम्पूर्ण मानवता के जीवन मूल्यों में निरंतर स्पंदित होता रहता है। उन्होंने कहा कि संसद से लेकर न्यायपालिका, विद्यालयों से लेकर चिकित्सालयों तक संवेदना, संरक्षण और सृजन का जो भाव दिखाई देता है, उसकी मूल प्रेरणा मातृत्व ही है। धरती की मां केवल अपने बच्चों की ही नहीं, बल्कि समस्त मानवता के सुख और कल्याण की कामना करती है। भारतीय संस्कृति में मातृत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माता यशोदा और भगवान कृष्ण के संबंध में देखने को मिलती है। उन्होंने कहा कि मातृत्व केवल जन्म देने का नहीं, बल्कि प्रेम, संरक्षण और संस्कार देने का भी नाम है। यही कारण है कि कृष्ण को संसार यशोदानंदन कहकर अधिक आत्मीयता से स्मरण करता है। स्तम्भकार ने कहा कि मां ही बच्चे की प्रथम गुरु होती है। वह केवल बोलना ही नहीं सिखाती, बल्कि प्रेम करना और प्रेम बांटना भी सिखाती है। मां का स्नेह जीवन के कठिनतम संघर्षों में भी व्यक्ति को टूटने नहीं देता। प्रसिद्ध शायर निदा फाजली की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मां के त्याग, श्रम और ममता की सुगंध हर व्यक्ति के जीवन में सदैव बनी रहती है। वहीं विश्व साहित्य में मैक्सिम गोर्की के उपन्यास मां का उदाहरण देते हुए मातृत्व को सामाजिक परिवर्तन और मानवीय संघर्ष की प्रेरक शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि आज के भौतिकतावादी और भागदौड़ भरे दौर में मातृत्व का शीतल स्पर्श समाज को मानवीय बनाए रखने का सबसे बड़ा आधार है। विश्व मातृ दिवस केवल शुभकामनाओं का अवसर नहीं, बल्कि मां के उस अनंत ऋण को स्मरण करने का दिन है, जिसे कोई भी संतान जीवनभर नहीं चुका सकती। अंत में उन्होंने कहा कि मां की ममता सचमुच रसोई की सौंधी महक से लेकर सम्पूर्ण सृष्टि तक पुदीने की तरह महक रही है।
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