गाजियाबाद
नोटिसों की कार्यवाही नहर में बह गई
सिंचाई विभाग की जमीन पर रोडी-बदरपुर माफिया का ‘सिंचित’ कारोबार, शिकायतें हुईं कागजों में दफन
लोनी बॉर्डर में सरकारी जमीन पर अवैध कारोबार का ‘स्वर्णिम युग’, विभागों की फाइलें दौड़ रहीं, बुलडोजर अब भी आराम फरमा रहा
नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
लोनी (गाजियाबाद)। लौनी बॉर्डर थाना क्षेत्र में नहर किनारे सिंचाई विभाग की जमीन पर रोडी, बदरपुर, रेत और डस्ट के अवैध कारोबार का ऐसा ‘विकास मॉडल’ देखने को मिल रहा है, जहां शिकायतें फाइलों में तो दौड़ती हैं, लेकिन कार्रवाई हमेशा रास्ता भटक जाती है। कालोनीवासियों का आरोप है कि सरकारी जमीन पर वर्षों से फल-फूल रहे इस कारोबार के खिलाफ दर्जनों शिकायतें आईं जी आर एस पोर्टल पर की गईं, लेकिन नतीजा आज भी केवल शून्य ही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सिंचाई विभाग और राजस्व विभाग के दफ्तरों में फाइलों का वजन जरूर लगातार बढ़ रहा है, मगर अवैध कब्जे से छुटकारा एक इंच भी कम नहीं हुआ। जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायतें लगातार दर्ज होती हैं, अधिकारी मौके पर निरीक्षण करते हैं, इसके बाद दिखावे के लिए नोटिस भी जारी होते हैं, पुलिस बल मांगा जाता है और फिर पूरा मामला अगले नोटिस तक के लिए बीच में छोड़ दिया जाता है
विभाग द्वारा फाइलों में नोटिस जारी, कार्रवाई फरार
शिकायतकर्ता सोहनबीर सिंह ने जून 2024 से मई 2025 तक आईजीआरएस पोर्टल पर लगातार अपनी कई शिकायतें दर्ज कराईं। हर बार विभागों की ओर से जवाब मिला कि नोटिस जारी कर दिया गया है, निरीक्षण कर लिया गया है, अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू है या पुलिस बल की मांग की गई है।
मगर स्थानीय लोगों का तंज है कि शायद कार्रवाई का रास्ता नहर में कहीं भटक गया है, क्योंकि मौके पर आज भी अवैध कब्जा और निर्माण सामग्री का कारोबार पहले की तरह धड़ल्ले जारी है।
विभागों के बीच ‘पासिंग द पार्सल’ का खेल
नागरिकों का आरोप है कि सिंचाई विभाग और राजस्व विभाग के बीच एक दूसरे पर जिम्मेदारी टालने का खेल कागजों में चल रहा है। कभी पुलिस बल की कमी का हवाला दिया जाता है तो कभी सीमांकन और नापजोख का। नतीजा यह कि अवैध कब्जाधारियों पर कार्रवाई की गेंद एक विभाग से दूसरे विभाग के पाले में लगातार उछाली जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि विभागीय नोटिस फाइलों में इतने सुरक्षित हैं कि शायद उन्हें धूप तक नसीब नहीं हो रही, जबकि अवैध कारोबार खुले आसमान के नीचे दिन-रात खूब फल-फूल रहा है।
गुलाब वाटिका से दिल्ली सीमा तक धूल ही धूल
गुलाब वाटिका कॉलोनी से लेकर दिल्ली सीमा तक नहर किनारे रोडी, बदरपुर, रेत और डस्ट का भंडारण एवं परिवहन खुलेआम होने का आरोप है। भारी वाहनों की आवाजाही और उड़ती धूल से क्षेत्र के लोगों का जीना मुश्किल हो गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सुबह घर साफ करो तो शाम तक फिर धूल की परत जम जाती है। प्रदूषण का स्तर क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभागों की संवेदनशीलता शायद धूल में ही दब कर रह गई है।
कोर्ट का फैसला भी नहीं रोक पाया अवैध कारोबार
स्थानीय नागरिकों के अनुसार इस मामले को लेकर न्यायालय में भी मुकदमा दायर किया गया था, जिसमें नागरिकों के पक्ष में फैसला आया। फैसले के बाद कुछ समय के लिए कारोबार बंद हुआ, लेकिन बाद में फिर उसी रफ्तार से शुरू हो गया।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब अदालत के आदेश भी स्थायी असर नहीं छोड़ पाए, तो फिर आम नागरिक अपनी शिकायत लेकर जाएं भी तो कहां जाएं?
अवैध उगाही और सांठगांठ के गंभीर आरोप
शिकायतकर्ता सोहनबीर सिंह ने आरोप लगाया है कि अवैध अतिक्रमण और कारोबार को संरक्षण देने के बदले मोटी रकम की उगाही की जा रही है। उनका कहना है कि इसी वजह से सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने की कार्रवाई केवल कागजों में दिखाई देती है।
उन्होंने इस पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराकर संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच भ्रष्टाचार निवारण विभाग से कराने की मांग की है।
सड़क पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियां, जनता जाम में बेहाल
नहर किनारे चल रहे निर्माण सामग्री के कारोबार के चलते सड़क किनारे खड़ी ट्रैक्टर-ट्रॉलियां और अन्य भारी वाहन आए दिन कालोनीवासियों के सामने जाम की समस्या पैदा कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अवैध कारोबार से न सिर्फ सरकारी जमीन प्रभावित हो रही है बल्कि यातायात व्यवस्था और पर्यावरण भी इसकी कीमत चुका रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों ने उच्चाधिकारियों को पत्र लिखकर
सिंचाई विभाग की भूमि को तत्काल अतिक्रमण मुक्त कराने,
अवैध रोडी, बदरपुर, रेत और डस्ट कारोबार पर रोक लगाने
प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई व
शिकायतों के निस्तारण में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है
भ्रष्टाचार और कथित सांठगांठ की निष्पक्ष जांच कराने
स्थानीय नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस मामले में प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन के साथ-साथ न्यायिक विकल्पों का भी सहारा लेने को मजबूर होंगे।



