
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
मथुरा। गोवर्धन पर्वत की 21 किलोमीटर लंबी परिक्रमा में भक्ति के कई रूप देखने को मिलते हैं। इनमें दंडवती परिक्रमा विशेष है, जिसे कलियुग में भक्ति का एक अनुपम उदाहरण माना जाता है। यह साधना मौन, निशान और नमन का स्वरूप है।
दंडवती परिक्रमा में भक्त जमीन पर लेटकर आगे बढ़ते हैं, जो काफी कठिन साधना मानी जाती है। मौन साधक बुद्धि भगत एक ही जगह 1161 बार दंडवती कर अगला कदम बढ़ाते हैं। उन्होंने जमीन पर 1161 लिखकर अपनी साधना की गहराई बताई। पूर्व स्वास्थ्य पर्यवेक्षक नंदकिशोर शर्मा (71) 21 और 42 निशान (ध्वजा के साथ) की दंडवती पूरी कर चुके हैं। वह अब 131 निशान के संकल्प के साथ प्रतिदिन चार कदम की यात्रा कर रहे हैं। राजाराम दास और नंदराम जैसे साधक भी 108 निशानों की परिक्रमा में लीन हैं। गिरिराज परिक्रमा कई तरीकों से की जाती है। पैदल परिक्रमा सबसे आम है, जिसमें भक्त नंगे पांव 21 किलोमीटर चलकर सात से आठ घंटे में पूरी करते हैं। दुग्धाधार परिक्रमा में मिट्टी के बर्तन से दूध की धार गिराते हुए परिक्रमा पूरी की जाती हैं, जिसमें करीब 40-45 लीटर दूध अर्पित किया जाता है। तीसरी हैं धूप परिक्रमा। इसमें धूप-धूनी और हवन सामग्री सुलगाकर वातावरण को शुद्ध करते हुए परिक्रमा लगाई जाती है।



