कैसे दो समझौते बढ़ा सकते हैं पुतिन की चिंता
अमेरिकी मदद के बिना रूस का सामना करेगा यूरोप?

नई दिल्ली : यूरोप ने बड़ा कदम उठाया है। यूरोप के नौ देशों के नेताओं ने हाल ही में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ पेरिस में एक बैठक की और यूरोप के अपने एकीकृत एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल गठबंधन को बनाने का एलान किया। इसके बाद यूरोपीय संघ (ईयू) और यूक्रेन ने साथ में ड्रोन बनाने के एक समझौते पर भी हस्ताक्षर कर दिए हैं।
दुनिया की दो महाशक्तियों अमेरिका और रूस ने बीते कई दशकों से अलग-अलग देशों के सुरक्षा मानक तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है। जहां पश्चिमी देश बड़े स्तर पर अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहे हैं तो वहीं पूर्वी देशों की निर्भरता सोवियत संघ और फिर रूस पर रही। हालांकि, अब यह स्थिति बदल रही है। जहां रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते मॉस्को की तरफ से सुरक्षा के लिए हथियारों की आपूर्ति पहले ही मुश्किल में पड़ चुकी है तो वहीं अब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के मनमाने फैसलों के बाद कई देश उससे भी अपनी निर्भरता घटाने की कोशिश में जुटे हैं।
इसी कड़ी में अब यूरोप ने बड़ा कदम उठाया है। यूरोप के नौ देशों के नेताओं ने हाल ही में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ पेरिस में एक बैठक की और यूरोप के अपने एकीकृत एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल गठबंधन को बनाने का एलान किया। अब बुधवार को यूरोपीय संघ (ईयू) और यूक्रेन ने साथ में ड्रोन बनाने के एक समझौते पर भी हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस घोषणा में यूरोप ने वादा किया कि वह अलग-अलग देशों की औद्योगिक क्षमताओं और करीबी सहयोग का सही इस्तेमाल करते हुए वह एक ऐसा रक्षा कवच बनाएगा, जो कि एकीकृत होगा और इसका ढांचा हर किसी को बचाएगा।
हालांकि, अगर करीब से देखा जाए तो सामने आता है कि यूरोप बीते कई वर्षों से रूस के संभावित हमलों से सुरक्षा के लिए विकल्प तलाशने में जुटा था। पहले यूरोप इस सुरक्षा के लिए अमेरिका पर बड़े स्तर पर निर्भर था। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी नीतियों के बाद अब यूरोप ने यूक्रेन के साथ अपनी सुरक्षा की तैयारी शुरू कर दी है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए यूरोप और यूक्रेन ने क्या-क्या तैयारियां की हैं और इससे किस तरह से रूस की परेशानी बढ़ सकती है? आइये जानते हैं…
पहले जानें- यूरोप और यूक्रेन के बीच कौन से समझौते हुए हैं?
हाल ही में यूरोप और यूक्रेन के बीच मुख्य रूप से दो प्रमुख रक्षा और रणनीतिक समझौते हुए हैं…
1. साझा मिसाइल रक्षा गठबंधन
यूक्रेन और नौ अन्य यूरोपीय देशों ने मिलकर यूरोप की सुरक्षा के लिए एक एकीकृत एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल कवच- फ्रेया (ऋफएखअ) और ब्लिकसेम एक्सो कार्यक्रम विकसित करने का समझौता किया है। इस समझौते के तहत रूस के मिसाइल हमलों का सामना करने के यूक्रेन के अनूठे अनुभव और तकनीक को यूरोपीय रक्षा कंपनियों की फंडिंग, रडार तकनीक और औद्योगिक निर्माण क्षमता के साथ जोड़ा जाएगा। इसका मुख्य लक्ष्य अगले 12 महीनों के अंदर एक कम लागत वाली और बड़े पैमाने पर उत्पादित होने वाली मिसाइल रक्षा प्रणाली तैयार करना है।
2. यूरोपीय संघ-यूक्रेन ड्रोन समझौता
यूक्रेन और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच बड़े पैमाने पर ड्रोन उत्पादन करने के लिए एक नए समझौते पर मुहर लगी है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उसुर्ला वॉन डेर लेयेन द्वारा घोषित इस ड्रोन डील का मकसद यूक्रेन की युद्धक्षेत्र की विशेषज्ञता (ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम में ज्ञान) को यूरोप के बड़े औद्योगिक ढांचे के साथ मिलाना है। यूरोप इस बात को समझ चुका है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका अहम है, इसलिए इस समझौते के जरिए यूक्रेन की तकनीक का उपयोग कर यूरोप सुरक्षित उत्पादन स्थलों पर अपने ड्रोन निर्माण का विस्तार करेगा।
अब जानें- मिसाइल रक्षा कवच बनाने के समझौते में कौन से देश शामिल?
यूरोप की इस नई मिसाइल कवच योजना, जिसे एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल गठबंधन के जरिए में कुल 10 देश शामिल हैं। इस साझा रक्षा कार्यक्रम का मुख्य मकसद यूरोप को बैलिस्टिक मिसाइलों के खतरों से बचाना है।
रूस के हमलों से सुरक्षा के लिए मिसाइड डिफेंस शील्ड बनाएगा यूरोप। – फोटो : अमर उजाला
कौन-कौन से देश मिसाइल कवच योजना में फिलहाल शामिल नहीं?
1. पोलैंड, बाल्टिक देश और फिनलैंड
यूरोप के यह देश भौगोलिक रूप से रूस के सबसे करीब स्थित हैं। इसके बावजूद यह देश अब तक मिसाइल कवच योजना में शामिल नहीं हुए हैं।
2. अमेरिका
अमेरिका भी इस गठबंधन का औपचारिक सदस्य नहीं है। बताया गया है कि इस गठबंधन का मुख्य लक्ष्य यूरोप के लिए अपनी खुद की स्वदेशी मिसाइल रक्षा क्षमता विकसित करना है। इसका मकसद महंगे अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम पर यूरोप की निर्भरता को कम करना है, जिनकी आपूर्ति मौजूदा समय में सीमित है।
यूरोप को बैलिस्टिक मिसाइल से रक्षा के लिए कदम क्यों उठाना पड़ा?
यूरोप की तरफ से बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (ब्लिक्सेम ईएक्सओ और फ्रेया प्रोग्राम) के लिए अब यह बड़ा कदम उठाना पड़ा है।
1. रूस-यूक्रेन युद्ध से मिली सीख और बढ़ता खतरा
यूक्रेन पर रूस के लगातार बैलिस्टिक मिसाइल हमलों ने यूरोप की कमजोर रक्षा प्रणाली की पोल खोल दी है। युद्ध के मैदान में मनमाफिक सफलता न मिलने के कारण रूस अब बैलिस्टिक मिसाइलों (जैसे इस्कंदर, किंजल और नई ओरेशनिक-क्लास मिसाइलें) और भारी ड्रोन हमलों पर ज्यादा निर्भर हो गया है, जिसे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने पुतिन का अंतिम दांव कहा है। इन लगातार हमलों ने बाकी यूरोप को भी मॉस्को के दायरा बढ़ाने के इरादों को लेकर सतर्क कर दिया है।
2. मौजूदा प्रणालियों की कमी और भारी लागत
मौजूदा समय में यूरोप अमेरिकी और फ्रांसीसी-इतालवी सैंप/टी एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भर है। हालांकि, अमेरिकी रक्षा सामग्री बेहद महंगी है और उनकी उत्पादन क्षमता दुनिया भर की मांग को पूरा नहीं कर पा रही है। साथ ही, यूक्रेन में युद्ध के दौरान फ्रांसीसी सैंप/टी मिसाइलों की भी काफी कमी देखी गई है।
3. अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना
यूरोप को यह अहसास हो गया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से वॉशिंगटन (अमेरिका) की सद्भावना पर निर्भर है। अमेरिका को फिलहाल ईरान से युद्ध के चलते अपनी सेनाओं, सैन्य ठिकानों और अन्य सहयोगियों, जैसे- पश्चिम एशिया के देशों को भी मिसाइलें देनी होती हैं। इससे हथियारों की आपूर्ति में अड़चनें आती हैं।
इतना ही नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यूरोप को अपने पैरों पर खड़ा होने और सुरक्षा के लिए रक्षा खर्च बढ़ाने के लिए खरी-खरी सुनाते रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यूरोप को सुरक्षा देने के एवज में इसकी कीमत वसूलने तक की बात कही थी। इसलिए यूरोप अपनी स्वदेशी रक्षा क्षमता विकसित करके सैन्य रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनना चाहता है।



