दिल्लीराष्ट्रीय

एक्सप्लेनर: अर्ली वार्निंग सिस्टम होने के बावजूद नेपाल में इतनी बड़ी तबाही कैसे हुई

कहां चूका सिस्टम?

नई दिल्ली। नेपाल में बाढ़ और मौसम से जुड़ी आपदाओं की निगरानी के लिए कई तंत्र मौजूद हैं, लेकिन रासुवा की अचानक आई बाढ़ ने इनकी सीमाएं सामने ला दीं। हिमस्खलन से पैदा हुई बाढ़ बेहद तेजी से नीचे पहुंची और लोगों को सुरक्षित जगह जाने के लिए बहुत कम समय मिला। ऐसे में सवाल उठता है कि नेपाल का मौजूदा अर्ली वार्निंग सिस्टम कहां कमजोर पड़ रहा है? आइए विस्तार से जानते हैं।
नेपाल के रासुवा इलाके में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। इसमें 475 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1500 से ज्यादा लोग लापता हैं। प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है, जो ट्रेकिंग, गाइडेड टूर या पवित्र हिंदू तीर्थस्थल की यात्रा के लिए क्षेत्र में पहुंचे थे।
इसके बाद सवाल उठा कि जब नेपाल में बाढ़ और मौसम से जुड़ी आपदाओं की निगरानी के लिए कई व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तो इतनी तेजी से आई बाढ़ में लोगों को बचने के लिए पर्याप्त समय क्यों नहीं मिल पाया। इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि नेपाल के पास कौन-कौन से निगरानी और चेतावनी तंत्र हैं? वे किस तरह काम करते हैं? कहां कमी रह गई? क्या चुनौतियां मौजूद हैं? रासुवा की बाढ़ किस तरह अलग थी?
नेपाल के पास बाढ़ की चेतावनी के लिए कौन-कौन से सिस्टम हैं?
नेपाल के जल व मौसम विज्ञान विभाग के पास बाढ़, मौसम और हिमालयी क्षेत्रों से जुड़े खतरों की निगरानी के लिए कई व्यवस्थाएं हैं। विभाग जल और मौसम से जुड़े आंकड़े जुटाने, उनका विश्लेषण करने और खराब मौसम व जल संबंधी घटनाओं की जानकारी लोगों और संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाने का काम करता है। मानसून के दौरान बाढ़ का पूवार्नुमान और शुरूआती चेतावनी भी जारी की जाती है।
नदी जलस्तर निगरानी प्रणाली-नेपाल में कई नदी निगरानी केंद्र हैं। इनमें लगे उपकरण नदी के जलस्तर और बहाव को मापते हैं और आंकड़े निगरानी केंद्रों तक भेजते हैं। नदियों के लिए चेतावनी और खतरे का स्तर भी तय किया जाता है, ताकि पानी एक निश्चित स्तर तक पहुंचने पर चेतावनी जारी की जा सके।
स्वचालित मौसम निगरानी प्रणाली-नेपाल में स्वचालित मौसम केंद्रों के जरिए बारिश और मौसम से जुड़े आंकड़े जुटाए जाते हैं। इनका इस्तेमाल मौसम की स्थिति समझने और बाढ़ के पूवार्नुमान में किया जाता है।
मौसम रडार-नेपाल में मौसम रडार भी हैं, जिनका इस्तेमाल बारिश और मौसम की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता है। इससे भारी बारिश जैसी घटनाओं की निगरानी में मदद मिलती है।
हिमपात निगरानी प्रणाली-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ और हिमपात की स्थिति पर नजर रखने के लिए स्वचालित हिमपात केंद्र मौजूद हैं। इनसे हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ से जुड़े बदलावों को समझने में मदद मिलती है।
हिमनद और हिमनद झील निगरानी-नेपाल में हिमनद और हिमनद झीलों की निगरानी भी की जाती है। इसके तहत ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ, हिमनद और झीलों में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाता है, ताकि उनसे जुड़े संभावित खतरों को पहचाना जा सके।
फ्लैश फ्लड पूवार्नुमान प्रणाली-आईसीआईएमओडी की फ्लैश फ्लड पूवार्नुमान प्रणाली नेपाल के 12,428 नदी खंडों के लिए संभावित फ्लैश फ्लड का अनुमान लगाती है और 54 घंटे पहले तक खतरे का पूवार्नुमान दे सकती है। इसमें बारिश और मौसम से जुड़े पूवार्नुमानों के आधार पर नदियों में संभावित पानी के बहाव का अनुमान लगाया जाता है।
इस व्यवस्था में बाढ़ के संभावित खतरे को अलग-अलग रंगों से दिखाया जाता है। नीला सामान्य स्थिति, पीला बढ़ा हुआ खतरा, नारंगी गंभीर खतरा और लाल बहुत ज्यादा बाढ़ के खतरे को दशार्ता है।
हालांकि, आईसीआईएमओडी के मुताबिक, यह व्यवस्था मुख्य रूप से तेज बारिश, गरज और स्थानीय मौसम से पैदा होने वाली फ्लैश फ्लड का पूवार्नुमान लगाने के लिए तैयार की गई है।
लंबी अवधि की नदी बहाव पूवार्नुमान प्रणाली
बड़ी नदियों के लिए अलग पूवार्नुमान व्यवस्था भी है। आईसीआईएमओडी के अनुसार, यह प्रणाली 519 नदी खंडों के लिए 10 दिन तक नदी के संभावित बहाव का अनुमान देती है।
सामुदायिक बाढ़ चेतावनी व्यवस्था
नेपाल में चेतावनी को स्थानीय लोगों तक पहुंचाने के लिए सामुदायिक स्तर की शुरूआती चेतावनी व्यवस्था भी विकसित की गई है। इसका उद्देश्य बाढ़ की जानकारी को स्थानीय समुदायों तक समय पर पहुंचाना है।
रासुवा में बाढ़ कैसे आई?
रासुवा में आई बाढ़ का कारण सामान्य तेज बारिश नहीं था। शुरूआती वैज्ञानिक आकलन में ऊंचाई वाले ल्हेंदे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मलबे के बहाव की बात सामने आई। उपग्रह विश्लेषण के अनुसार 600 मीटर से ज्यादा चौड़े हिमनद का एक हिस्सा करीब 1,200 मीटर नीचे गिरा, जिससे बर्फ, चट्टान, पानी और मलबा तेजी से नीचे आया और भोटेकोशी नदी तंत्र में शक्तिशाली बाढ़ की लहर पैदा हुई।
घटना इतनी तेज थी कि इससे भूकंप जैसी भूकंपीय तरंग पैदा हुई। शुरूआत में इसे भूकंप से जोड़ा गया, लेकिन बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के विश्लेषण में इसे हिमनद के टूटने और मलबे के बहाव से जोड़कर देखा गया। हालांकि नदी के अस्थायी रूप से रुकने या पानी जमा होने जैसी किसी प्रक्रिया की भूमिका रही थी या नहीं, इसकी पूरी जांच अभी जारी है।
ऐसी बाढ़ में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
द काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, नेपाल की मौजूदा चेतावनी व्यवस्था नदी में बाढ़ आने के बाद उसके बढ़ते जलस्तर को पकड़ सकती है, लेकिन बाढ़ पैदा करने वाली घटना अगर ऊंचाई वाले क्षेत्र में हो तो उसे स्रोत पर पकड़ना ज्यादा मुश्किल है। हिमनद टूटने, बर्फ-चट्टान गिरने या भूस्खलन जैसी घटना के बाद जब तक उसका असर नीचे नदी में लगे निगरानी केंद्र तक पहुंचता है, तब तक चेतावनी के लिए मिलने वाला समय काफी कम हो सकता है।
यानी यहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि चेतावनी व्यवस्था मौजूद थी या नहीं। असली सवाल यह है कि बाढ़ पैदा करने वाली घटना का पता कब चला और लोगों तक चेतावनी पहुंचने से पहले कितना समय बचा।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button