
डॉ. अंशुला गर्ग की कलम से…
( लेखिका दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म,दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक अध्यापिका हैं )
“या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥“
विद्या व ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना को समर्पित यह मंत्र; हमें बारंबार यह याद दिलाता है कि हे देवी मां आप विद्या, ज्ञान, चेतना, शक्ति, कला, दया, और माता के रूप में सभी प्राणियों में व सर्वत्र व्याप्त हैं। आपको हम बारम्बार नमन करते हैं। वसंत पंचमी के अवसर पर, जब ज्ञान और रचनात्मकता की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है, तब इस मंत्र का जाप किया जाता है।
वसंत पंचमी का त्योहार ज्ञान, संगीत और कला की देवी मां सरस्वती के जन्म से जुड़ा है और उन्हीं को समर्पित है। इस दिन को विद्या, बुद्धि और रचनात्मकता के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जिसमें छात्र पीले वस्त्र पहनकर, किताबें और वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं। इस प्रकार यह विद्यार्थियों का भी दिन है, इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की पूजा आराधना भी की जाती है।
देवी मां सरस्वती की उत्पत्ति और वसंत पंचमी का संबंध:
मान्यता है कि माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (वसंत पंचमी) को मां सरस्वती का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन उनकी विशेष पूजा की जाती है। हिंदु पौराणिक कथाओं में प्रचलित एक कथा के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने संसार की रचना की। अपनी रचना में उन्हें कुछ कमी लगी तो संसार में देखते थे, चारों ओर अजीब सा सन्नाटा छाया रहता था और सुनसान दिखाई देता था। पूरी सृष्टि वाणी विहीन थी। वे सोच में पड़ गए कि आखिर क्या कमी है। इसी दौरान ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे चार हाथों वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उस स्त्री के एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथा हाथ वर मुद्रा में था। ब्रह्मा जी ने इस सुंदर देवी से वीणा बजाने को कहा, जैसे वीणा बजी ब्रह्मा जी की बनाई हर चीज़ में स्वर आ गया। तभी ब्रह्मा जी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती नाम दिया। माघ शुक्ल पंचमी को देवी सरस्वती की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए हर साल वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्मदिन मनाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। मां सरस्वती विद्या, बुद्धि, संगीत, कला और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं, जिनकी पूजा से ज्ञान, एकाग्रता और मधुर वाणी का आशीर्वाद मिलता है।
वसंत पंचमी का महत्व:
यह वसंत ऋतु के आगमन का उत्सव है, जो प्रकृति में बहार लाता है। इस दिन पीले रंग के वस्त्र, फूल और प्रसाद (जैसे पीली बूंदी) चढ़ाए जाते हैं, जो पवित्रता और मधुरता का प्रतीक हैं। विद्यार्थी अपनी पुस्तकें, कलम और वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं और शिक्षा में सफलता के लिए प्रार्थना करते हैं। वसंत पंचमी को श्री पंचमी या सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है और यह होली की तैयारियों की शुरुआत का भी प्रतीक है।
ऋतुराज वसंत का आगमन:
वसंत पंचमी से ही ऋतुओं के राजा ‘वसंत’ की शुरुआत होती है। यह दिन हम सभी को अज्ञानता के अंधेरे से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
बसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात् सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। इस समय पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। पंच-तत्त्व- जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। बहुत तेज ठंड कम होने लगती है और प्रकृति में नया उल्लास और हरियाली छाने लगती है। शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है। पत्रपटल तथा पुष्प खिल उठते हैं। स्त्रियाँ पीले-वस्त्र पहन, बसंत पंचमी के इस दिन के सौन्दर्य को और भी अधिक बढ़ा देती हैं। लोकप्रिय खेल पतंगबाज़ी, बसंत पंचमी से ही जुड़ा है। आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती, उसका तो कहना ही क्या वह तो मानो साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाते। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो वहीं निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने पर सुख की अनुभूति करने लगते हैं। प्रकृति तो मानो उन्मादी हो जाती है। ऐसा अनुभव होता है जैसे प्रकृति का पुनर्जन्म हो गया हो। श्रावण की पनपी हरियाली, शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब बसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। नवगात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षण बना देता है।
वसंत ऋतु का महत्व:
वसंत ऋतु का वर्णन शास्त्रों व पुराणों में सुंदर सजीव वर्णन के रूप में मिलता है। इस मौसम को पीले रंग से भी जोड़ा गया है, जो समृद्धि का प्रतीक है. यही कारण है कि वसंत पंचमी यानी सरस्वती पूजा के दिन महिला व पुरुष पीले रंग के परिधान पहन कर वसंत का स्वागत करते हैं। ज्योतिष आचार्य पंडित दशरथ नंदन द्विवेदी बताते हैं कि मौसम प्रकृति के बदलाव का अहसास दिलाता है। हर बदलती हुई ऋतु अपने साथ एक संदेश लेकर आती है। भारत की प्रकृति के अनुसार हमारे यहां छः ऋतुएं प्रमुख रूप से मानी जाती है। बसंत ऋतु भी सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ है। हेमंत, शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा व शरद ऋतु। इनमें वसंत को सभी ऋतुओं के राजा की संज्ञा दी गई है, क्योंकि इस ऋतु में धरती की उर्वरा शक्ति यानि उत्पादन क्षमता अन्य ऋतुओं की अपेक्षा बढ़ जाती है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं को ऋतुओं में वसंत कहा है। वे सारे देवताओं और परम शक्तियों में सबसे ऊपर हैं वैसे ही बसंत ऋतु भी सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ है।
दशरथ नंदन द्विवेदी ने कहा कि वसंत को ऋतुओं का राजा कहने के पीछे कई कारण हैं जैसे- फसल तैयार रहने से उल्लास और खुशी के त्यौहार, मंगल कार्य, विवाह, सुहाना मौसम, आम की मोहनी खुशबू, कोयल की कूक, शीतल मन्द सुरभित हवा, खिलते फूल, मतवाला माहौल, सुहानी शाम, फागुन के मदमस्त करने वाले गीत सब मिलकर अनुकूल समां बांधते हैं।
आयुर्वेद में वसंत ऋतु का महत्व:
आयुर्वेद विशेषज्ञ नागेंद्र नारायण शर्मा लिखते हैं कि वसंत पंचमी के आगमन से प्रकृति में बदलाव आने महसूस होने लगते हैं। पेड़ों पर नयी कोपलें, रंग-बिरंगे फूलों की खुशबू व पक्षियों की सुरीली आवाज गूंजने लगती है। खेतों में दूर-दूर तक सरसों के पीले फूल दिखते हैं और होली की उमंग भरी मस्ती दिखने लगती है। साथ ही इस ऋतु में प्रकृति खुद को संवारती है। मनुष्य के अलावा पशु-पक्षी उल्लास से भर जाते हैं। आम के पेड़ों पर मंजर भर आते हैं। इस तरह से आयुर्वेद में भी वसंत ऋतु का काफी महत्व है।
इस ऋतु को ऊर्जस्कर माना गया है। इस समय शौंठ, नागरमोथा, त्रिफला चूर्ण, नीम के पत्ते को काली मिर्च के साथ पीस कर 21 दिन तक प्रयोग करने से अगले एक वर्ष तक रक्त साफ रहता है। इससे शरीर को चर्म रोग से निजात पाने में मदद मिलती है।
पौराणिक इतिहास:
विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वाग्देवी को चार भुजा युक्त व आभूषणों से सुसज्जित दर्शाया गया है। स्कंद पुराण में सरस्वती जटा-जुटयुक्त, अर्धचन्द्र मस्तक पर धारण किए, कमलासन पर सुशोभित, नील ग्रीवा वाली एवं तीन नेत्रों वाली कही गई हैं। रूप मंडन में वाग्देवी का शांत, सौभ्य व शास्त्रोक्त वर्णन मिलता है। संपूर्ण संस्कृति की देवी के रूप में दूध के समान श्वेत रंग वाली सरस्वती के रूप को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। सरस्वती ने अपने चातुर्य से देवों को राक्षसराज कुंभकर्ण से कैसे बचाया, इसकी एक मनोरम कथा वाल्मिकी रामायण के उत्तरकांड में आती है। कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हज़ार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए तो देवों ने कहा कि यह राक्षस पहले से ही है, वर पाने के बाद तो और भी उन्मत्त हो जाएगा तब ब्रह्मा ने सरस्वती का स्मरण किया। सरस्वती राक्षस की जीभ पर सवार हुईं। सरस्वती के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- “स्वप्न वर्षाव्यनेकानि। देव देव ममाप्सिनम”। यानी मैं कई वर्षों तक सोता रहूँ, यही मेरी इच्छा है।
कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव घोर तपस्या में लीन थे। उस समय तारकासुर नाम के एक असुर को वरदान मिला हुआ था कि उसके जीवन का अंत केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव होगा। यह जान कर कि भगवान शिव तो लंबे समय तक घोर तपस्या में रहने वाले हैं और एक तपस्वी होने के नाते माता सती द्वारा आत्मदाह करके प्राण त्यागने के कारण उनके पुनः विवाह करने की संभावना अति क्षीण हो गई है, उसने समूची पृथ्वी पर उत्पात करना आरंभ कर दिया। इसी बीच देवी सती का पार्वती के रूप में पुनर्जन्म हुआ। पार्वती ने भगवान शिव को पुनः प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प लिया था। किंतु भगवान शिव पर इसका कोई असर नहीं हुआ। तब पार्वती ने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा। वसंत पंचमी का ही दिन था जब कामदेव भगवान शिव के पास गए और उन्होंने भगवान शिव का ध्यान आकर्षित करने और उनकी तपस्या भंग करने के उद्देश्य से कैलाश पर्वत पर एक मायावी इंद्रधनुष बनाया। अंत में भगवान शिव की समाधि तो भंग हो गई परंतु क्रोधित हो कर उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया। उसके पश्चात उन्होंने पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। उस विवाह से जन्मे भगवान कार्तिकेय ने अंततः तारकासुर का अंत किया।
मत्स्यपुराण का उल्लेख:
सरस्वती देवी के इसी रूप एवं सौंदर्य का एक प्रसंग मत्स्यपुराण में भी आया है, जो लोकपूजित पितामह ब्रह्मा के चतुर्मुख होने का कारण भी दर्शाता है। जब ब्रह्मा जी ने जगत् की सृष्टि करने की इच्छा से हृदय में सावित्री का ध्यान करके तप प्रारंभ किया, उस समय उनका निष्पाप शरीर दो भागों में विभक्त हो गया। इसमें आधा भाग स्त्री और आधा भाग पुरुष रूप हो गया। वह स्त्री सरस्वती, ‘शतरूपा’ नाम से विख्यात हुई। वही सावित्री, गायत्री और ब्रह्माणी भी कही जाती है। इस प्रकार अपने शरीर से उत्पन्न सावित्री को देखकर ब्रह्मा जी मुग्ध हो उठे और कहने लगे- “कैसा सौंदर्यशाली रूप है, कैसा मनोहर रूप है”। तदनतर सुंदरी सावित्री ने ब्रह्मा की प्रदक्षिणा की, इसी सावित्री के रूप का अवलोकन करने की इच्छा होने के कारण ब्रह्मा के मुख के दाहिने पार्श्र्व में एक नूतन मुख प्रकट हो गया, पुनः विस्मय युक्त एवं फड़कते हुए होठों वाला तीसरा मुख पीछे की ओर उद्भूत हुआ तथा उनके बाईं ओर कामदेव के बाणों से व्यथित एक मुख का आविर्भाव हुआ। अतः स्पष्ट है कि ऐसी शुभ, पवित्र तथा सौंदर्यशाली देवी अति धवल रूप सरस्वती देवी की उपासना भी तभी पूर्णतया फलीभूत हो सकती है, जब स्वयं ईश्वर तथा प्रकृति के द्वारा ऐसा पवित्र एवं शांत वातावरण निर्मित हो, हम अपने मन को पूर्णतया निर्मल एवं शांत बनाकर पूर्ण रूपेण देवी की उपासना में लीन करें एवं नैसर्गिक पवित्र वातावरण में रहकर मन, वचन एवं कर्म से पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति से शारदा देवी की उपासना करें एवं उनकी कृपा दृष्टि के पूर्ण अधिकारी बन जाएं।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण:
ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य को ब्रह्माण्ड की आत्मा, पद, प्रतिष्ठा, भौतिक समृद्धि, औषधि तथा ज्ञान और बुद्धि का कारक माना गया है। इसी प्रकार पंचमी तिथि किसी न किसी देवता को समर्पित है। बसंत पंचमी को मुख्यतः सरस्वती पूजन के निमित्त ही माना गया है। सरस्वती का जैसा शुभ श्वेत, धवल रूप वेदों में वर्णित किया गया है, वह इस प्रकार है-
“या कुन्देन्दु-तुषार-हार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणा-वर दण्डमण्डित करा या श्वेत पद्मासना। या ब्रह्मा-च्युत शंकर-प्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता, सा माँ पातु सरस्वती भगवती निः शेषजाडयापहा।“
अर्थात् “देवी सरस्वती शीतल चंद्रमा की किरणों से गिरती हुई ओस की बूंदों के श्वेत हार से सुसज्जित, शुभ वस्त्रों से आवृत, हाथों में वीणा धारण किये हुए वर मुद्रा में अति श्वेत कमल रूपी आसन पर विराजमान हैं। शारदा देवी ब्रह्मा, शंकर, अच्युत आदि देवताओं द्वारा भी सदा ही वन्दनीय हैं। ऐसी देवी सरस्वती हमारी बुद्धि की जड़ता को नष्ट करके हमें तीक्ष्ण बुद्धि एवं कुशाग्र मेधा से युक्त करें।“
वसंत पंचमी का त्यौहार अन्य पंथ संप्रदायों में भी:
वसंत पंचमी मुख्य रूप से हिन्दू त्यौहार है, लेकिन भारत और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अन्य धर्मों और समुदायों द्वारा भी मनाया जाता है। जो इस त्यौहार के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव को दर्शाता है, मुख्यत: वसंत ऋतु के स्वागत और ज्ञान की देवी सरस्वती के सम्मान के रूप में।
पंजाब में सिख इसे पतंग उत्सव के रूप में मनाते हैं, जिसमें पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं, जो सरसों के पीले खेतों और वसंत के आगमन का प्रतीक है। महाराजा रणजीत सिंह ने भी इसे बड़े धूमधाम से मनाया था।
इंडोनेशिया (बाली) के लोग, जिनमें हिन्दू और बौद्ध दोनों शामिल हैं, इस दिन को “सरस्वती दिवस” के रूप में मनाते हैं। वे ज्ञान और कला की देवी सरस्वती की पूजा करते हैं, जिसमें सुबह से ही अनुष्ठान शुरू होते हैं।
भारत के कुछ हिस्सों में, खासकर जहाँ सूफ़ी संतों का प्रभाव है, मुस्लिम समुदाय भी वसंत पंचमी के सांस्कृतिक पहलुओं को मनाते हैं, जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य और ज्ञान से जुड़ाव महसूस किया जाता है। जानकारी के अनुसार दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पिछले 800 साल से वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जा रहा है। इस पर्व को मनाने की शुरुआत अमीर खुसरो ने की थी।
स्वामीनारायण संप्रदाय में वसंत पंचमी एक विशेष त्योहार है, क्योंकि इसी दिन भगवान स्वामीनारायण के दो प्रमुख शिष्यों, निश्कुलानंद स्वामी और ब्रह्मानंद स्वामी का जन्म हुआ था।
पीले वस्त्र पहनने की विशेषता:
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी पर पीला रंग (Yellow Colour) इसलिए पहना जाता है क्योंकि पीला रंग सकारात्मकता, नई किरणों और नई ऊर्जा प्रदान करने का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही, मां सरस्वती का प्रिय रंग भी पीला ही कहा जाता है। मां सरस्वती की विशेष पूजा के दिन पीले वस्त्र पहने जाते हैं। सफेद रंग भी मां सरस्वती को प्रिय है। वस्त्रों के अलावा पीले रंग के फूल मां सरस्वती को अर्पित किये जाते हैं और उन्हें विराजमान करने के लिए भी पीले रंग के वस्त्र को आसन पर बिछाया जाता है।
शास्त्रों में बताया गया है कि पीला रंग सुख, शांति प्रदान करने वाला है। यह रंग तनाव को दूर करने वाला होता है। सूर्य के उत्तरायण रहने से सूर्य के प्रकाश में पीलापन बढ़ जाता है। इन दिनों में प्रकृति में पीले रंग की अधिकता होती है, इसलिए बसंत पंचमी के दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं।
पीला रंग पहनने की ये भी मान्यताएं:
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के कपड़े पहनने के पीछे कई मान्यताएं जुड़ी हैं। पीला रंग भगवान सूर्य देव को समर्पित है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें अंधकार का विनाश करती हैं, उसी प्रकार पीला रंग मनुष्य के हृदय में बसी बुरी भावना को नष्ट करता है, इसलिए इस दिन पीला रंग पहनना शुभ माना गया है।
इसके अलावा, ज्योतिष शास्त्र में पीले रंग को बेहद शुभ रंग माना गया है। पीला रंग मनुष्य को मनोबल प्रदान करता है और साथ ही हर कार्य में सफलता प्रदान करता है।
भगवान विष्णु का प्रिय वस्त्र भी पीला है, जो असीम ज्ञान का प्रतीक है। इसके अलावा, भगवान श्री गणेश की धोती भी पीली होती है और सभी मंगल कार्यों में पीले रंग की धोती पहनना शुभ माना जाता है।
नवीन कार्यों के लिए शुभ दिन:
बसंत पंचमी को सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। मुख्यतः विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए बसंत पंचमी को पुराणों में भी अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है। बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त मानने के पीछे अनेक कारण हैं। यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है। माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस माह में पवित्र तीर्थों में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस समय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है, अर्थात् उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है। सूर्य की कांति 22 दिसम्बर को अधिकतम हो जाती है और यहीं से सूर्य उत्तरायण शनि हो जाते हैं। 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और अगले 6 माह तक उत्तरायण रहते हैं। सूर्य का मकर से मिथुन राशियों के बीच भ्रमण उत्तरायण कहलाता है। देवताओं का दिन माघ के महीने में मकर संक्रांति से प्रारंभ होकर आषाढ़ मास तक चलता है। तत्पश्चात् आषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास शुक्ल पक्ष एकादशी तक का समय भगवान विष्णु का निद्रा काल अथवा शयन काल माना जाता है। इस समय सूर्यदेव कर्क से धनु राशियों के बीच भ्रमण करते हैं, जिसे सूर्य का दक्षिणायन काल भी कहते हैं। सामान्यतः इस काल में शुभ कार्यों को वर्जित बताया गया है। चूंकि बसंत पंचमी का पर्व इतने शुभ समय में आता है, अतः इस पर्व का स्वतः ही आध्यात्मिक, धार्मिक, वैदिक आदि सभी दृष्टि से अति विशिष्ट महत्व परिलक्षित होता है।



