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क्या टूट की कगार पर है टीएमसी

ऐसी अटकलें क्यों; ममता या अभिषेक बनर्जी, किससे खफा पार्टी नेता, अब आगे क्या?

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में हाल ही में कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिनसे ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस में चल रही अंदरूनी कलह अब टूट का रूप ले सकती है। खासकर चुनावी नतीजों के बाद चाहे प्रमुख नेताओं के शीर्ष नेतृत्व को लेकर दिए बयानों की बात हो या फिर पार्षदों और फिर विधायकों के बागी रवैये की। अटकलें हैं कि टीएमसी में यह आंतरिक विवाद टीएमसी को दो हिस्सों में तोड़ सकता है।
पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के बाद से ही सियासी हलचल का दौर जारी है। राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में टूट को लेकर अटकलों का दौर तेज है। कहा जा रहा है कि पहले जो विवाद टीएमसी के नेताओं और कार्यकतार्ओं के बीच उभरा था, वह अब विधायकों और शीर्ष नेताओं के बीच पहुंच चुका है। खासकर टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर पार्टी के नेताओं-कार्यकतार्ओं में खासी नाराजगी बताई जा रही है। ऐसी भी चर्चा है कि अगर यह विवाद जारी रहा तो टीएमसी का हाल महाराष्ट्र में शिवसेना जैसा हो जाएगा, जिसके अधिकतर सांसद और विधायक पार्टी के सर्वेसर्वा उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ चले गए थे।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पश्चिम बंगाल पर 15 साल तक शासन करने वाली टीएमसी में हालिया चुनाव नतीजों के बाद ऐसा क्या हुआ है कि पार्टी की टूट की अटकलें लग रही हैं? इसके पीछे के कारण क्या हैं? इसे लेकर ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का क्या रुख है? टीएमसी में बगावत पर भाजपा का क्या कहना है? आखिर क्यों तृणमूल में इस पूरे विवाद की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट के घटनाक्रम से की जा रही है? आइये जानते हैं…
टीएमसी में टूट की चर्चा ने कब से पकड़ा जोर?
तृणमूल कांग्रेस में टूट और बगावत की चर्चा ने मुख्य रूप से 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद जोर पकड़ा। 4 मई को चुनाव नतीजे घोषित होने के साथ टीएमसी का राज्य पर 15 साल का शासन समाप्त हो गया और भाजपा ने बहुमत (208 सीटें) हासिल किया, जबकि टीएमसी मात्र 80 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद से टीएमसी के कार्यकतार्ओं और नेताओं ने लगातार इस हार के लिए शीर्ष नेतृत्व (ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी) के साथ चुनाव लड़ने वाले नेताओं को घेरा है।
क्या है टीएमसी में अंतर्कलह की वजह?
1. अभिषेक बनर्जी और आईपैक के बढ़ते वर्चस्व से नाराज कैडर
टीएमसी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ जमीनी कार्यकतार्ओं में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि पार्टी में ममता बनर्जी के भतीजे- अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ गया और पुराने नेताओं को दरकिनार कर दिया गया। चुनाव नतीजों में टीएमसी की हार के बाद सबसे ज्यादा गुस्सा चुनाव रणनीतिकार कंपनी आईपैक को दिए गए अधिकारों को लेकर उभरा। कई नेताओं का मानना था कि आईपैक ने टीएमसी संगठन को हाईजैक कर लिया, पुराने नेताओं को किनारे कर कॉरपोरेट शैली थोपी और जमीनी कार्यकतार्ओं से पार्टी का संपर्क खत्म कर दिया। कार्यकतार्ओं और नेताओं ने आरोप लगाए कि आईपैक की सलाह पर ही पार्टी ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काटे थे। उनकी जगह जिन लोगों को टिकट दिए गए उनमें से 51 चुनाव हार गए।
2. भ्रष्टाचार के आरोप और डायमंड हार्बर मॉडल की नाकामी
चुनाव नतीजों के बाद से ही टीएमसी शासन के दौरान लंबे समय तक उभरते रहे भ्रष्टाचार के कई मामलों को भी पार्टी के नेताओं ने हार की वजह माना है। इनमें स्कूल भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी मामला, कट-मनी और भाइपो (भतीजा) टैक्स के आरोप शामिल हैं। इसके अलावा, फाल्टा में अभिषेक के बहुचर्चित डायमंड हार्बर मॉडल की करारी हार के तुरंत बाद कई स्थानीय पार्षदों ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि इस मॉडल ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और पुलिस के दम पर विरोधियों को दबाया। जनता और पार्टी कैडर का गुस्सा ममता बनर्जी की बजाय सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी पर निकल रहा है। पार्टी के कई नेताओं ने अलग-अलग मीडिया समूहों से कहा है कि भ्रष्टाचार के उन आरोपों का बचाव करते-करते वे असहज महसूस कर रहे थे, जो सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी से जुड़े हैं।
3. मजबूत विचारधारा की कमी और सत्ता से बाहर रहने का डर
विश्लेषकों के मुताबिक, टीएमसी से जुड़े कई नेता, खासकर फिल्मी सितारे और युवा चेहरे मुख्य रूप से सत्ता और ममता बनर्जी के चेहरे के कारण पार्टी से जुड़े थे। वैचारिक जड़ों के अभाव और 2026 के चुनाव में भाजपा (208 सीटें) से मिली भारी शिकस्त के कारण ये नेता पूरे पांच साल विपक्ष में बैठने से कतरा रहे हैं। इस वजह से कई नेता भाजपा जैसी मजबूत पार्टी की ओर रुख करने के विकल्प तलाश रहे हैं।
4. पुराने नेता बनाम नए नेतृत्व की स्थिति
ममता बनर्जी ने 1998 में जब तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था, तब वह उम्र के 40वें दशक में थीं, हालांकि मौजूदा समय में उनकी उम्र 71 वर्ष है और पार्टी के अंदर स्पष्ट तौर पर उनके वफादार पुराने नेताओं और अब अभिषेक बनर्जी के नए नेतृत्व के बीच एक दरार आ गई है। हाल ही में टीएमसी के ही कई विधायकों ने बागी रुख अख्तियार किया है और कथित तौर पर एक अलग गुट बनाने की योजना बनाई है, जिसे वे मूल पार्टी से अलग चाहते हैं।
इन अंतर्कलहों के जवाब में ममता बनर्जी ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि पार्टी केवल अपने कार्यकतार्ओं के लिए है, न कि नेताओं के लिए, और जो अवसरवादी नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, उनके बिना ही पार्टी ज्यादा बेहतर है।
5. नेता प्रतिपक्ष के पद पर गुटबाजी और फर्जी हस्ताक्षर विवाद
पार्टी के अंदर पदों को लेकर भी भारी खींचतान है। यह कलह तब और बढ़ गई जब विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम आगे बढ़ाने वाले आधिकारिक पत्र पर कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर पाए गए। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा नामक विधायकों ने जब इसकी शिकायत की, तो पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया। ऐसा भी दावा किया जा रहा है कि बागी विधायकों का एक गुट ऋतब्रत बनर्जी को ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाने पर विचार कर रहा है, जो सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व को चुनौती है।
टीएमसी में टूट की अटकलें क्यों?
विधायकों की अहम बैठक का बहिष्कार: टूट का सबसे बड़ा संकेत तब मिला जब टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की तरफ से बुलाई गई विधायक दल की एक अहम बैठक में पार्टी के 80 में से लगभग 60 विधायक शामिल ही नहीं हुए। विधायकों की इस भारी गैरहाजिरी की वजह से इस बैठक को टालना पड़ा और केवल 20 विधायकों के साथ एक अनौपचारिक चर्चा ही हो सकी।
गुप्त बैठकें और असली तृणमूल गुट की तैयारी: ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई हैं कि कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निष्कासित विधायकों- ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने कोलकाता के ईएम बाईपास स्थित एक होटल में लगभग 50 बागी विधायकों के साथ कई गुप्त बैठकें की हैं। दावा किया जा रहा है कि यह बागी गुट खुद को असली तृणमूल के रूप में पेश करने और एक अलग धड़ा बनाने पर विचार कर रहा है। दल-बदल विरोधी कानून से अयोग्यता से बचने के लिए इन्हें 53 विधायकों (दो-तिहाई) के समर्थन की जरूरत है और वे कथित तौर पर इस आंकड़े को जुटाने की कोशिश में हैं।
सामूहिक इस्तीफे और बड़े नेताओं का किनारा करना: पार्टी में इस्तीफों की झड़ी लग गई है। एक ओर जहां सात नगर निकायों के 100 से अधिक पार्षदों ने टीएमसी से इस्तीफा दे दिया है। वहीं फाल्टा चुनाव में हार के 24 घंटे के भीतर डायमंड हार्बर नगर पालिका के नौ पार्षदों ने भी इस्तीफा दे दिया। इसके अलावा सांसद काकोली घोष दस्तीदार, शांतनु सेन और अरूप चक्रवर्ती जैसे वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के पदों से इस्तीफा दे दिया है, जबकि मनोज तिवारी, राज चक्रवर्ती और अभिजीत मजूमदार जैसे चेहरों ने पार्टी ही छोड़ दी।
विपक्षी खेमे (भाजपा) से बढ़ती नजदीकियां: टीएमसी की संस्थापकों में से एक मानी जाने वालीं सांसद काकोली घोष दस्तीदार और नदिया, उत्तर 24 परगना और हुगली जिलों के छह टीएमसी विधायकों ने मौजूदा मुख्यमंत्री और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ एक प्रशासनिक बैठक में हिस्सा लिया, जो दल-बदल की संभावनाओं की ओर एक बड़ा इशारा रहा।
टीएमसी में टूट को लेकर ममता-अभिषेक बनर्जी का क्या रुख
1. ममता बनर्जी का रुख
एक फेसबुक लाइव में ममता बनर्जी ने पार्टी के अंदर बगावत की बात को भी स्वीकार किया। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह पुलिस का दबाव बनाकर, डरा-धमकाकर और रिश्वत देकर विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने बंगाल की मौजूदा स्थिति की तुलना हिटलर के राज से की और कहा कि इस तरह के दबाव से टीएमसी कमजोर नहीं होगी, बल्कि और मजबूत होगी।
ममता बनर्जी ने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए स्पष्ट किया है कि जो लोग सत्ता का फायदा उठाने आए थे, उनके जाने से पार्टी ज्यादा बेहतर स्थिति में है। उन्होंने कहा कि टीएमसी अपने नेताओं के लिए नहीं, बल्कि अपने कार्यकतार्ओं के लिए है और जब तक जमीनी कार्यकर्ता उनके साथ हैं, वे पार्टी को नए सिरे से खड़ा करेंगी। दूसरी ओर उन्होंने बागी विधायकों (ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा) के निष्कासन का बचाव करते हुए सख्त लहजे में कहा कि निजी महत्वाकांक्षाओं को संगठन के हितों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
2. अभिषेक बनर्जी का रुख और स्थिति
पार्टी में टूट और गुटबाजी के बीच अभिषेक बनर्जी सार्वजनिक बयानबाजी से ज्यादा कानूनी मामलों में उलझे हुए हैं। 6 मई को नवनिर्वाचित विधायकों के साथ बैठक (जिसमें विपक्ष के नेता के नाम पर मुहर लगी थी) अभिषेक बनर्जी ने ही संचालित की थी। फर्जी हस्ताक्षर विवाद में पश्चिम बंगाल सीआईडी ने अभिषेक बनर्जी को मूल प्रस्ताव पुस्तिका के साथ पूछताछ के लिए समन भेजा। हालांकि, अभिषेक बनर्जी सोनारपुर में हाल ही में उन पर हुए कथित शारीरिक हमले से उबर रहे हैं। इसी हमले और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए, वे तय दिन पर सीआईडी के सामने पेश नहीं हुए और उन्होंने एजेंसी से दो हफ्ते का समय मांगा है।
टीएमसी में चल रही कलह पर भाजपा का क्या रुख?
टीएमसी में चल रही इस अंतर्कलह और बगावत को भाजपा ने टीएमसी का अंदरूनी मामला बताया है और टीएमसी नेतृत्व की तरफ से लगाए गए आरोपों को खारिज किया है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के उन आरोपों को सिरे से खारिज किया है, जिनमें टीएमसी सुप्रीमो ने भाजपा पर उनकी पार्टी को तोड़ने की कोशिश का आरोप लगाया। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि फर्जी हस्ताक्षर मामले में जो एफआईआर दर्ज हुई है और सीआईडी जांच चल रही है, वह किसी राजनीतिक बदले के तहत नहीं, बल्कि खुद टीएमसी विधायकों द्वारा की गई शिकायतों का नतीजा है।
ऐसी अटकलें हैं कि टीएमसी के बागी नेता भाजपा में जा सकते हैं। हालांकि, रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा टीएमसी के दलबदलू नेताओं को शामिल करने को लेकर सतर्क है। इसका मुख्य कारण यह है कि 2021 के चुनावों में भाजपा ने जब टीएमसी के बागियों को टिकट दिया था, तो मतदाताओं ने उन्हें टीएमसी के ही भ्रष्टाचार से जोड़कर देखा था, जिससे भाजपा को नुकसान हुआ था।
खुद भाजपा प्रदेशाध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि टीएमसी के लिए उनकी पार्टी के दरवाजे बंद हैं। उन्होंने कहा, हमने किसी को भी बाहर से लाए बिना 207 का आंकड़ा छू लिया। लोगों ने टीएमसी के नेताओं के खिलाफ वोट दिया। इस बार हमारी राजनीतिक रणनीति बिल्कुल जमीनी स्तर से शुरू हुई थी।

इस विवाद की तुलना शिवसेना की टूट से क्यों हो रही?
टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) में चल रही मौजूदा बगावत और संकट की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और यहां तक कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की टूट से भी की जा रही है, क्योंकि इन दोनों राजनीतिक घटनाक्रमों में काफी समानताएं हैं।

मूल संस्थापक से पार्टी छिनने का डर: महाराष्ट्र में जिस तरह उद्धव ठाकरे और शरद पवार को अपनी ही बनाई पार्टियों से हाथ धोना पड़ा, ठीक वैसे ही टीएमसी के मामले में भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या ममता बनर्जी भी उस पार्टी पर अपना नियंत्रण खो देंगी, जिसकी उन्होंने 1998 में स्थापना की थी। इस बात की आशंका जताई जा रही है कि पार्टी के बागी नेता ममता बनर्जी से पूरी पार्टी ही छीन सकते हैं।

‘असली पार्टी’ होने का दावा: महाराष्ट्र में बागी गुट ने खुद को ‘असली शिवसेना’ बताया था। इसी तरह टीएमसी में भी निलंबित नेता रिजु दत्ता के दावों के मुताबिक, 50 से ज्यादा बागी विधायकों ने एक अलग धड़ा बनाने पर विचार किया है, जिसे वे असली तृणमूल के नाम से पेश करने की योजना बना रहे हैं।

दल-बदल कानून से बचने का गणित: दल-बदल विरोधी कानून के तहत विधायकों की अयोग्यता से बचने के लिए, एक अलग गुट को पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। टीएमसी के 80 विधायकों में से यह आंकड़ा 53 बैठता है। कई रिपोर्ट्स में दावा है कि यह असंतुष्ट बागी खेमा 50 से अधिक विधायकों के संपर्क में है। हाल ही में 60 विधायकों ने ममता बनर्जी की एक अहम बैठक से किनारा भी किया था।

विधानसभा के नेतृत्व में बदलाव की कोशिश: महाराष्ट्र संकट की तर्ज पर ही, टीएमसी का यह बागी गुट विधानसभा के अंदर पार्टी के नेतृत्व में बदलाव की कोशिश कर रहा है। पार्टी नेतृत्व को सीधी चुनौती देते हुए, बागी विधायकों का एक गुट अधिकृत उम्मीदवार- शोभनदेव चट्टोपाध्याय की जगह निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को ही कथित तौर पर विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने की कोशिश रहा है।

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