
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बागपत। शिक्षा और खेल जगत के लिए एक खास अवसर बन गया, जब प्रो. दीपक चंद्र मौर्य को दिगम्बर जैन डिग्री कॉलेज के प्राचार्य (प्रिंसिपल) का कार्यभार सौंपा गया। यह सिर्फ एक पदभार ग्रहण नहीं था, बल्कि संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की एक लंबी यात्रा का सम्मान था।
प्रश्न : सर, अपने जीवन के शुरुआती सफर के बारे में बताइए।
उत्तर (प्रो. दीपक चंद्र मौर्य):
मेरा जीवन किसी बड़े शहर या बड़े साधनों से नहीं, बल्कि एक साधारण परिवेश से शुरू हुआ। बचपन में कई बार ऐसा भी हुआ जब संसाधन नहीं थे, लेकिन सपने हमेशा बड़े थे। खेल के मैदान में पसीना बहाते-बहाते मैंने यह सीखा कि अगर इंसान हार नहीं मानता, तो हालात खुद उसके सामने झुक जाते हैं।
प्रश्न: आपकी शैक्षिक और खेल यात्रा काफी मजबूत रही है, इस सफर में क्या खास रहा?
उत्तर:
मैंने एम.ए., एम.पी.एड., नेट और पीएचडी की, लेकिन इन डिग्रियों के पीछे बहुत संघर्ष छुपा है। पढ़ाई और खेल दोनों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। कई रातें बिना नींद के गुजरीं, कई बार शरीर थक गया, लेकिन मन कभी नहीं हारा।
नेशनल मास्टर्स वेटलिफ्टिंग में दो बार गोल्ड मेडल जीतना मेरे लिए सिर्फ जीत नहीं, बल्कि मेरे संघर्षों की पहचान है।
प्रश्न: 16 मार्च 2026 से प्रिंसिपल बनने का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर:
जब मैंने प्रिंसिपल के रूप में कार्यभार संभाला, तो वह पल मेरे जीवन का सबसे भावुक क्षण था। ऐसा लगा जैसे वर्षों की मेहनत एक मुकाम पर पहुंच गई। लेकिन यह सिर्फ पद नहीं है, यह जिम्मेदारी है—हर उस छात्र के सपनों की, जो मेरी तरह कुछ बनना चाहता है।
प्रश्न: आज के युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है, खासकर जब वे भटकाव का सामना कर रहे हैं?
उत्तर:
आज का युवा बहुत तेज है, लेकिन रास्ता सही होना जरूरी है। नशा और गलत संगत धीरे-धीरे इंसान को खत्म कर देती है। मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ—मैदान में आओ, खेलो, गिरो, उठो… लेकिन खुद को खोने मत दो। खेल आपको सिर्फ मजबूत शरीर नहीं, मजबूत आत्मा भी देता है।
प्रश्न: क्या कभी ऐसा पल आया जब लगा कि अब आगे बढ़ना मुश्किल है?
उत्तर:
हां, कई बार ऐसे पल आए जब लगा कि अब सब खत्म हो गया। लेकिन हर बार मैंने अपने माता-पिता का चेहरा याद किया, अपने गुरुजनों की सीख याद की… और फिर खुद को संभाल लिया। जीवन में गिरना गलत नहीं, लेकिन गिरकर उठना ही असली जीत है।
प्रश्न: एक शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में आप अपने छात्रों के साथ कैसा रिश्ता रखते हैं?
उत्तर:
मैं उन्हें सिर्फ छात्र नहीं मानता, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा समझता हूँ। जब कोई छात्र सफल होता है, तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरा अपना बच्चा आगे बढ़ा है। उनकी खुशी ही मेरी सबसे बड़ी कमाई है।
प्रश्न: आपके अनुसार खेलों का असली महत्व क्या है?
उत्तर:
खेल हमें जिंदगी जीना सिखाते हैं—हार को स्वीकार करना, जीत में विनम्र रहना और हर परिस्थिति में खुद को संभालना। खेल इंसान को सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनाते हैं।
प्रश्न (सुरेंद्र मलानिया): अपनी सफलता का श्रेय किसे देंगे?
उत्तर:
मैं अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, गुरुजनों और अपने विद्यार्थियों को देता हूँ। अगर उनका साथ और विश्वास नहीं होता, तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।
“प्रो. दीपक चंद्र मौर्य की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो संघर्षों से घिरे हुए हैं। उनकी आंखों में आज भी वही जुनून और सादगी दिखाई देती है, जो उन्हें भीड़ से अलग बनाती है। ऐसे लोग समाज को दिशा देते हैं, प्रेरणा देते हैं और यह सिखाते हैं कि सच्ची जीत मेहनत और धैर्य से ही मिलती है।”
प्रो. दीपक चंद्र मौर्य का जीवन यह साबित करता है कि संघर्ष चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर संकल्प मजबूत हो तो सफलता जरूर मिलती है।
खेल के मैदान से लेकर शिक्षा के शिखर तक उनकी यह यात्रा हर युवा के लिए एक प्रेरणा है।

