गाजियाबाद
“मुद्दा गाली-गलौज पर कार्रवाई का है या 2027 के टिकट का
गालियों से पंचायत तक पहुंची लोनी की सियासत
विधायक बनाम तीन कद्दावर नेताओं की जंग में भाजपा नेतृत्व मौन, पुलिस जांच पर सत्ता के दबाव के सवाल ,हर पंचायत में शक्ति प्रदर्शन, जनता पूछ रही असली लड़ाई किस बात की?
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : लोनी की राजनीति इन दिनों विकास के मुद्दों से ज्यादा एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति प्रदर्शन के लिए सुर्खियों में है। भाजपा विधायक नंदकिशोर गुर्जर और पार्टी से जुड़े तीन प्रमुख नेताओं अनिल कसाना, डॉ. विनोद सिंह बंसल और ईश्वर मावी के बीच गाली गलौच को लेकर उपजा विवाद अब थाने से निकलकर पंचायतों तक पहुंच चुका है। हालात ऐसे हैं कि एक तरफ कथित गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार के आरोपों पर कार्रवाई की मांग उठ रही है, तो दूसरी तरफ लगातार पंचायतों के जरिए अपने-अपने खेमे की ताकत दिखाई जा रही है।
विडंबना यह है कि मुद्दा अगर वास्तव में गाली-गलौज और कानून-व्यवस्था का है तो पंचायतों में ताकत दिखाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? और अगर असली मुद्दा राजनीतिक वजूद तथा 2027 के विधानसभा टिकट है, तो फिर गाली-गलौज और पुलिस कार्रवाई का मुद्दा कहीं राजनीतिक पटकथा का हिस्सा तो नहीं बन गया?
गालियों की बौछार के बाद पंचायतों में ‘हम मजबूत हैं’ का एलान
5 सितंबर को लोनी नंबर-2 बस स्टैंड के पास रेड फ्लेम होटल में हुए कथित विवाद के बाद मामला लगातार गरमाता गया। विरोधी नेताओं की ओर से विधायक पर अभद्र भाषा और धमकी समेत कई आरोप लगाए गए हैं तथा पुलिस कमिश्नर से शिकायत कर CCTV फुटेज की जांच की मांग की गई है। दूसरी ओर विधायक पक्ष की ओर से इन नेताओं पर पार्टी विरोधी गतिविधियों और विवादित लोगों के समर्थन जैसे आरोप लगाए गए हैं।
अब सवाल यह है कि यदि शिकायत पुलिस के पास है और मामला जांच का है तो इन नेताओं द्वारा क्षेत्रीय
पंचायतों में अपनी-अपनी ताकत का हिसाब-किताब क्यों पेश किया जा रहा है?
क्या पंचायतें न्याय का मंच बन रही हैं या फिर 2027 की राजनीतिक जमीन नापने का नया पैमाना?
लोनी में एक तरफ विधायक समर्थकों की पंचायत में समर्थन का प्रदर्शन हुआ तो दूसरी ओर विरोधी नेताओं के समर्थन में भी पंचायतें आयोजित हुईं। यानी जिस विवाद की शुरुआत गाली-गलौज से हुई, वह अब गांव-गांव राजनीतिक लोगों का मनपसंद चर्चा का विषय बनता दिखाई दे रहा है।
भाजपा नेतृत्व की खामोशी पर भी उठ रहे सवाल
सबसे बड़ा सवाल भाजपा संगठन से जुड़ा है। जब विवाद पार्टी के अपने नेताओं के बीच हो और मामला पुलिस कमिश्नर तक पहुंच जाए, तो संगठन की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
लेकिन जमीनी स्तर पर संदेश यही जा रहा है कि नीचे नेता आमने-सामने हैं और ऊपर संगठन की खामोशी अभी भी बरकरार है।
नतीजा यह कि हर खेमा अपनी पंचायत को अपनी ताकत और दूसरे की पंचायत को कमजोरी बताने में जुटा है।
सियासत का यह नया गणित भी कम दिलचस्प नहीं है जिसके साथ ज्यादा लोग दिखाई दिए, वह खुद को मजबूत बता रहा है और जिसके खिलाफ ज्यादा सवाल उठे, वह खुद को पीड़ित बता रहा है। जनता आखिर तय करे तो किस आधार पर?
पुलिस की भूमिका पर भी जनता की निगाहें
तीनों नेताओं की शिकायत में कथित धमकी, अभद्र भाषा और वाहनों में तोड़फोड़ जैसे आरोपों की जांच की मांग की गई है। ऐसे में अब निगाहें पुलिस की जांच पर हैं।वह कहां तक पहुंची, जांच चल भी रही है या केवल आदेश सरकारी फाइलों की ही शोभा बढ रहे हैं यह सवाल भी जनता में खूब चर्चा में है
यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है तो कार्रवाई की मांग स्वाभाविक है। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते तो जांच के निष्कर्ष भी सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।
लेकिन यहां भी सवाल उठना लाजिमी है क्या पुलिस स्वतंत्र रूप से जांच करेगी या राजनीतिक रस्साकशी का असर जांच की दिशा पर पड़ेगा?
लोनी की जनता को पंचायतों के भाषण नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच का परिणाम चाहिए।
मुद्दा गाली देने वाले पर कार्रवाई का है या टिकट की लड़ाई का?
पूरे विवाद का सबसे अहम राजनीतिक पहलू 2027 का विधानसभा चुनाव बनकर उभर रहा है। विरोधी खेमे की ओर से विधायक की दोबारा उम्मीदवारी का विरोध करने की बातें सामने आ चुकी हैं।
यहीं से जनता के मन में असली सवाल पैदा होता है क्या लड़ाई अभद्र भाषा बोलने वाले के खिलाफ कार्रवाई की है या विधानसभा टिकट की दावेदारी की?
यदि मुद्दा सिर्फ सम्मान और कानून का है तो जांच और कार्रवाई का रास्ता साफ है। लेकिन यदि इसके पीछे 2027 की राजनीतिक जमीन तैयार करने की कवायद भी चल रही है, तो पंचायतों का यह सिलसिला चुनाव तक चलता दिखाई दे सकता है।
यानी माइक पर समाज, मंच पर सम्मान और पर्दे के पीछे टिकट का हिसाब!
राजनीति में ऐसा समीकरण नया नहीं है, लेकिन इस बार लोनी में यह समीकरण खुलकर दिखाई दे रहा है।
पहले भी विधायक को मिला था नोटिस, अब संगठन की परीक्षा
वर्ष 2025 में विधायक नंदकिशोर गुर्जर को अपनी ही सरकार के खिलाफ कथित बयानबाजी के मामले में पार्टी की तरफ से कारण बताओ नोटिस जारी होने की बात सामने आई थी। ऐसे में वर्तमान विवाद भाजपा संगठन के लिए भी एक परीक्षा की स्थिति पैदा करता है।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसकी पंचायत बड़ी थी और किसके साथ कितने लोग खड़े थे। असली सवाल यह है कि पार्टी अनुशासन, कानून और राजनीतिक मर्यादा के मामले में संगठन का स्पष्ट रुख क्या है?
लोनी की जनता को ‘पंचायतों का शोर’ नहीं, जवाब चाहिए
फिलहाल लोनी की सियासत में हर खेमा खुद को मजबूत साबित करने में जुटा है। कोई गांवों की संख्या गिना रहा है, कोई समर्थकों की भीड़, तो कोई राजनीतिक प्रभाव।
लेकिन जनता के सामने सवाल अब भी वहीं खड़ा है
गाली-गलौज हुई तो कार्रवाई कब होगी?
शिकायत हुई तो निष्पक्ष जांच कब होगी?
CCTV है तो उसकी जांच का परिणाम कब आएगा?
और यदि असली लड़ाई 2027 के टिकट की है, तो जनता को सामाजिक पंचायतों के नाम पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन क्यों दिखाया जा रहा है?
लोनी की सियासत में फिलहाल गाली गलौच की गूंज, पंचायतों का शोर और टिकट का गणित तीनों साथ-साथ चल रहे हैं। भाजपा नेतृत्व की चुप्पी इस कहानी को और लंबा कर रही है। अब देखना यह है कि इस सियासी जंग पर संगठन अनुशासन की लगाम कसता है, पुलिस जांच अपना रास्ता तय करती है या फिर 2027 की टिकट खिड़की खुलने तक लोनी में पंचायतों का यह राजनीतिक मौसम यूं ही चलता रहता है।

