गाजियाबाद

सात लाख की आबादी, एक कमरा और ढेर सारे वादे

लोनी का डाकघर ‘दूर संचार भवन’ में संचालित

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी (गाजियाबाद)। डिजिटल इंडिया के चमकते पोस्टरों के बीच लोनी का डाकघर शायद “मिनिमलिज्म” की नई परिभाषा गढ़ रहा है। करीब सात लाख की आबादी का भरोसा जिस डाक व्यवस्था पर टिका है, वह इन दिनों दूरसंचार विभाग की जर्जर इमारत के एक अदद कमरे में सिमटकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। हालात ऐसे हैं कि इमारत को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यहां डाकघर भी चलता है या यह किसी बीते दौर की सरकारी धरोहर है, जिसे भूलवश अभी तक गिराया नहीं गया।
एक कमरे में समाया ‘डिजिटल युग’
जिस कमरे में डाक सेवाएं संचालित हो रही हैं, वहां कर्मचारी भी शायद ‘एडजस्टमेंट’ पर शोध कर सकते हैं। कंप्यूटर ऑपरेटर और काउंटर कर्मचारी कंधे से कंधा मिलाकर नहीं, बल्कि सचमुच सटकर काम करने को मजबूर हैं। अभिलेखों को रखने की जगह इतनी है कि फाइलें भी शायद सोचती हों ,“हम यहां क्यों हैं?”
ग्राहकों के लिए इंतजार की व्यवस्था ऐसी कि अगर दो लोग खड़े हो जाएं तो तीसरे को लोकतांत्रिक तरीके से बाहर रहना पड़ता है।
जर्जर भवन, मजबूत दावे
भवन की हालत खुद सरकारी उपेक्षा का जीवंत प्रदर्शन है। मुख्य द्वार सुरक्षा से ज्यादा असुरक्षा का एहसास कराता है। परिसर में धूल और गंदगी इस बात का प्रमाण हैं कि सफाई अभियान शायद यहां का रास्ता भूल चुका है।
स्थानीय लोग बताते हैं कि वर्षों से मरम्मत की सुध नहीं ली गई। लेकिन चिंता की बात नहीं,फाइलों में सब “संतोषजनक” ही होगा।
योजनाएं कागज पर, जानकारी हवा में
जनधन खाते, सुकन्या समृद्धि योजना, डाक बचत योजनाएं, आधार सेवाएं—कागजों में सब उपलब्ध हैं। बस जानकारी और जगह की छोटी-सी कमी है। लोनी की बड़ी आबादी को यह तक नहीं मालूम कि उनका डाकघर आखिर है कहां। मजबूरन लोग गाजियाबाद मुख्य डाकघर या शाहदरा की ओर रुख करते हैं।
शायद विभाग का मानना है कि जागरूकता अपने आप पैदा हो जाती है,जैसे धूल के कण।
दूरसंचार विभाग भी ‘साथ-साथ’
जिस इमारत में डाकघर चल रहा है, उसी में दूरसंचार विभाग भी अपने पुराने ढांचे के सहारे भविष्य की ओर देख रहा है। उपकरण पुराने, भवन जर्जर और रखरखाव नदारद। लेकिन उम्मीद कायम है,किसी दिन सब ठीक हो जाएगा।
अधिकारी मौन, जनता त्रस्त
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने आधुनिक डाक भवन के निर्माण और टेलीकॉम इमारत की मरम्मत की मांग उठाई है। मगर अधिकारियों की चुप्पी बता रही है कि सात लाख की आबादी की परेशानी फिलहाल प्राथमिकता सूची में शायद नीचे कहीं आराम फरमा रही है।
डाकघर के कर्मचारी भी दबी जुबान में अपनी परेशानी की व्यथा कहते सुने जाते हैं—जगह की कमी, सुविधाओं का अभाव और बढ़ता कामकाज। मगर सिस्टम की दीवारें मोटी हैं, आवाजें अक्सर बाहर नहीं निकल पातीं।
अब सवाल यह है कि क्या लोनी को कभी एक स्वतंत्र, सुसज्जित और पहचान योग्य डाक भवन मिलेगा, या फिर सात लाख की आबादी यूं ही एक कमरे के भरोसे “सेवा में तत्पर” व्यवस्था का अनुभव करती रहेगी?
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