असम

असम वन विभाग में MCC का खुला उल्लंघन

गंभीर आरोपों के वाबजूद अबतक कोई कार्रवाई नहीं।

मुख्यसचिव ओर निर्वाचन आयोग से तत्काल कार्रवाई की मांग। 

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो 

असम विधानसभा चुनावों के दौरान मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) लागू होने के बावजूद वन विभाग में वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती को लेकर एक नई विवादास्पद बहस छिड़ गई है। सचेत मंडली और अन्य निरीक्षण‑आधारित संगठनों का आरोप है कि कई डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) अपने गृह जिले में ही तैनात हैं या एक ही स्थान पर तीन साल से अधिक समय से कार्यरत हैं, जो भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के स्पष्ट दिशा‑निर्देशों का खुला उल्लंघन माना जा रहा है। आरोप के अनुसार, अशोक देव चौधरी (AFS) अपने गृह जिले कामरूप मेट्रोपॉलिटन में ही कामरूप ईस्ट डिवीजन के डीएफओ के रूप में तैनात हैं, जबकि MCC के तहत गृह जिले से अलग रखने की स्पष्ट सिफारिश है। साथ ही, अश्वनी कुमार (IFS) लगभग पांच वर्ष से असम स्टेट जू कम बोटैनिकल गार्डन, गुवाहाटी के डायरेक्टर के पद पर स्थापित हैं, जबकि एक ही पद पर तीन साल से अधिक समय तक रहने से लागू नियमों का उल्लंघन होने का आरोप लगाया जा रहा है। इसी तरह, अखिल दत्ता (AFS) हैलाकांदी वन डिवीजन में लगभग चार वर्ष से, भी. पालवे (IFS) सिलचर स्थित बराक वैली वन्यजीव डिवीजन में तीन से अधिक वर्ष से, तेजस मरिस्वामी (IFS) गोवालपारा वन डिवीजन में तीन से अधिक वर्ष से तथा सुहास कदम ताराचंद (IFS) नगांव वन डिवीजन में लगभग तीन वर्ष से डीएफओ हैं। निरीक्षण समूहों का आरोप है कि ये सभी तैनातियां MCC के भीतर राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र से जुड़ी हैं, जिससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। MCC के तहत चुनाव प्रचार की अवधि 7 अप्रैल को समाप्त हो गया और 15 मार्च से चार मई तक पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान यह मामला निर्वाचन आयोग के सामने आया, मीडिया में इसका प्रचार भी जोड़ों से हुआ, मगर अब तक न तो भारत निर्वाचन आयोग और न ही असम के मुख्य सचिव डॉ. रवि कोटा की ओर से इस संबंध में कोई सार्वजनिक या दृश्यमान ठोस कदम उठाया गया है।सचेत मंडली ने MCC के तहत वन विभाग जैसे संवेदनशील विभागों में तैनाती और स्थानांतरण की पूरी प्रक्रिया की विशेष जांच की मांग की है और आरोपित DFOs के तत्काल स्थानांतरण या पद से हटाए जाने की दावा रखी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो राज्य के विधानसभा चुनावों की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर गंभीर संदेह उठेगा। निर्वाचन आयोग के विशेष पर्यवेक्षक मंजीत सिंह के साथ‑साथ भारत निर्वाचन आयोग को तत्काल हस्तक्षेप करने और आंतरिक नियमों के अनुपालन की रिपोर्ट तैयार करने की ओर भी अपील की गई है। MCC लागू होने के बावजूद ऐसी तैनातियों को बरकरार रखना चुनावी माहौल को “राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण” बनाने का खतरा पैदा कर रहा है, यह भी दावा किया जा रहा है कि जनता में इस पर तहकीकात और त्वरित सुधारकारी कदमों की मांग गहरी हो रही है। असम वन विभाग और राज्य सरकार की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट या सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिससे निर्वाचन आयोग पर ही नहीं, बल्कि राज्य के लोकतांत्रिक प्रक्रिया के उदासीनता पर भी सवाल उभर रहे हैं। सचेत मंडली और अन्य निरीक्षण‑आधारितो का मानना है कि यदि निर्वाचन आयोग इस मामले में तुरंत कार्रवाई करता है, तो यह असम में चुनावी निष्पक्षता और लोकतंत्र की मजबूती को एक स्पष्ट संकेत देगा; नहीं तो भविष्य के चुनावों की विश्वसनीयता पर दीर्घकालीन संकट पैदा हो सकता है।

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