
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
अमेठी। सिरमौर बौद्ध विहार सोइया यात्रा समिति की ओर बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्रा पर गए दल ने बुधवार को कुशीनगर में भगवान बुद्ध के स्तूप और निर्वाण मंदिर के दर्शन किए और भगवान बुद्ध को चीवर दान किया।
यात्री दल ने सुबह लगभग सवा नौ बजे चीवर दान किया। चीवर दान के बाद इस ऐतिहासिक स्थल के बारे में जानकारी ली।
निर्वाण मंदिर में बलुए पत्थर की बनी हुई बुद्ध की लेटी हुई मुद्रा में विशालकाय प्रतिमा है,जिसकी लम्बाई 6.10मी है। यह 2.74मी ऊंची है और भूतल से ऊंचाई 19.81मी है।1927मे उत्खनन 4.27मी नीचे ताम पत्र और ताम्र अभिलेख प्राप्त हुए थे।10.36मी नीचे भगवान बुद्ध की मूर्ति ध्यान मुद्रा में प्राप्त हुई थी। पहली बार उत्खनन और जीर्णोद्धार 1876में कार्लाइल ने कराया था। भारत सरकार की संस्तुति पर एक समिति 1956में इसका जीर्णोद्धार कराया था।
कुशीनगर के भ्रमण एवं ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी ली और दोपहर बाद यहां से कपिलवस्तु के लिए रवाना हुआ।
यात्रा के छठवें दिन मंगलवार को यात्रियों ने वैशाली में स्थित विश्व शांति स्तूप का दर्शन किया और वहीं पर मौजूद के स्थान को भी देखा और नमन किया।
भंते बुद्ध वंश ने कहा कि वैशाली की आम्रपाली लगभग 600-500 ईसा पूर्व की एक प्रसिद्ध नगरवधू (शाही वेश्या) थीं। उन्हें आम के पेड़ के नीचे पाया गया था, इसलिए उनका नाम ‘आम्रपाली’ पड़ा। उन्होंने अपनी सुंदरता और नृत्यकला से कई शासकों को प्रभावित किया और अंततः उन्होंने गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को स्वीकार करके भिक्षुणी बनकर अपना जीवन बदल लिया। आम्रपाली का जन्म एक अज्ञात माता-पिता के यहाँ हुआ था और उन्हें वैशाली के शाही उद्यानों में एक आम के पेड़ के नीचे पाया गया था। इस कारण उनका नाम ‘आम्रपाली’ रखा गया, जिसका अर्थ “आम के पत्तों से उत्पन्न” है।
अपनी असाधारण सुंदरता और नृत्यकला के कारण वे प्रसिद्ध हुईं। उनके सौंदर्य से प्रभावित होकर वैशाली के राजा मनु देव ने उन्हें एक नगरवधू बना दिया, ताकि वे सभी के आकर्षण का केंद्र बनें और वैशाली में अशांति न फैले।
राजाओं से संबंध: राजा बिम्बिसार और अजातशत्रु जैसे कई शासक उनसे मोहित थे। अजातशत्रु के प्रेम में भी एक समय वह पड़ गई थीं, लेकिन वैशाली के लोगों के कारण यह संबंध नहीं बन पाया और इसका परिणाम युद्ध हुआ।
गौतम बुद्ध से मिलने के बाद, आम्रपाली का जीवन पूरी तरह से बदल गया। वे बुद्ध की शिक्षाओं से इतना प्रभावित हुईं कि उन्होंने अपना नगरवधू का जीवन त्याग दिया। उन्होंने बुद्ध को अपने यहाँ भोजन के लिए आमंत्रित किया। बुद्ध के उपदेशों से प्रेरित होकर, वे अरिहंत बनीं और बुद्ध की शिष्या और एक महान भिक्षुणी के रूप में अपना शेष जीवन बिताया।
इसके उपरांत यात्रियों ने लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित कोल्हुआ जनपद मुजफ्फरपुर में खुदाई के दौरान निकले अशोक स्तंभ को दिखा। आगे बढ़ते हुए हम यात्रियों ने केसरिया बौद्ध स्तूप का भी दर्शन किया उसके बाद देर शाम कुशीनगर पहुंचे।
सातवें दिन यात्रा में यात्रा समिति के अध्यक्ष बृजेश कुमार, एडवोकेट कुल रोशन, हरिकेश भारती, सुनील कुमार और एडवोकेट सत्येन्द्र कुमार भी शामिल हुए और साथ में चीवर दान किया।
धम्म यात्रा की अगवाई बामसेफ के जिला सह संयोजक फूलचंद बौद्ध, श्री राम बौद्ध,राम शंकर दानी, हरीलाल कोरी, हरिश्चंद्र कोरी,रामचंद्र यादव, रामकुमार बौद्ध , डा रामसागर बौद्ध ने की।
यात्रा में अर्चना बौद्ध शकुंतला बौद्ध, आरती बौद्ध, रामेश्वर बौद्ध, पारस मौर्य, गंगाराम कश्यप, विश्राम बौद्ध, मनोज कुमार बौद्ध, शिवानी बौद्ध, श्री राम बौद्ध, आलोक कुमार आदि मौजूद रहे।

