बागपत
ढाई साल… जब छपरौली ने विकास को महसूस किया

धर्मेंद्र खोखर चेयरमैन, नगर पंचायत छपरौली, बागपत।
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
भूमिका (वॉइस ओवर / भूमिका लेख):
छपरौली—एक ऐसा कस्बा, जहाँ विकास सिर्फ़ योजनाओं में नहीं,
बल्कि गलियों, सड़कों, नालियों और लोगों की ज़िंदगी में नज़र आने लगा।
इन ढाई वर्षों में अगर किसी नाम ने भरोसा जगाया,
तो वो नाम है—धर्मेंद्र खोखर।
सवाल – सुरेंद्र मलानिया
चेयरमैन साहब, ढाई साल पूरे हो चुके हैं। जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो क्या महसूस करते हैं?
धर्मेंद्र खोखर (भावुक स्वर में):
महसूस… एक शब्द में कहूँ तो जिम्मेदारी।
कुर्सी पर बैठना आसान होता है,
लेकिन जनता की उम्मीदों को उठाकर चलना—वो कठिन होता है।
मैं गर्व से नहीं, विनम्रता से कहता हूँ
कि मैंने छपरौली को अपना घर समझकर काम किया।
सवाल
इन ढाई वर्षों में ऐसा कौन सा काम है जो आपके दिल के सबसे क़रीब है?
धर्मेंद्र खोखर:
सड़कें, नालियाँ, लाइटें—ये ज़रूरी हैं,
लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा काम है
जनता का भरोसा लौटाना।
जब कोई बुज़ुर्ग आकर कहे—
“बेटा, अब दफ्तर के चक्कर नहीं लगाने पड़ते,”
तो वही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
विकास की ज़मीन पर उतरती तस्वीर
कच्ची गलियों का पक्की सड़कों में बदलना
वर्षों से उपेक्षित नालियों का निर्माण
स्ट्रीट लाइटों से रौशन होती शामें
साफ़-सफ़ाई को लेकर बदली हुई सोच
बिना भेदभाव के वार्डों में विकास कार्य
धर्मेंद्र खोखर:
मैंने कभी यह नहीं पूछा कि वोट किसने दिया।
मैंने सिर्फ़ यह देखा—किसे ज़रूरत है।
सवाल
राजनीति में रहते हुए भावनात्मक बने रहना कितना मुश्किल होता है?
धर्मेंद्र खोखर (कुछ रुककर):
बहुत मुश्किल…
लेकिन अगर आप भावनाएं खो दें,
तो इंसान नहीं, सिर्फ़ नेता रह जाते हैं।
छपरौली के लोग मेरे अपने हैं—
उनकी परेशानी मुझे सोने नहीं देती,
और उनकी मुस्कान मुझे थकने नहीं देती।
जनता की आवाज़ (डॉक्यूमेंट्री कट)
“पहली बार चेयरमैन को फ़ोन लगाने पर काम हुआ।”
“कभी अहंकार नहीं देखा।”
“हर वर्ग, हर मोहल्ला—सब बराबर।”
सवाल
आने वाले समय के लिए आपका सपना?
धर्मेंद्र खोखर:
मैं चाहता हूँ कि छपरौली
सिर्फ़ एक कस्बा न रहे,
बल्कि एक मिसाल बने—
जहाँ विकास दिखे भी और महसूस भी हो।
समापन — सुरेंद्र मलानिया
ढाई साल का समय इतिहास नहीं होता,
लेकिन अगर नीयत साफ़ हो,
तो वही ढाई साल
कस्बे की यादों में अमर हो जाते हैं।
धर्मेंद्र खोखर का कार्यकाल
छपरौली के लिए
सिर्फ़ प्रशासन नहीं,
एक भरोसे की कहानी बन चुका है।



