राज्यपाल को लिखा पत्र,कुलपति के प्रशासनिक विफलता और जातीय भेदभाव से करवाया अवगत।

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
हज़ारीबाग झारखंड मुक्ति मोर्चा के चंदन सिंह ने राज्यपाल सह कुलाधिपति को पत्र लिख कर बताया कि जहाँ कुलपति का पद जिम्मेदारी भरा है वहीं प्रतिष्ठा और सम्मान का पद भी है।उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे यह सबसे महत्वपूर्ण पद माना गया है।
झारखंड जैसे शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े राज्य के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में इस पद की गरिमा और बढ़ जाती है।विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय का लगभग छह माह का कार्यकाल पूरा विवादों से भरा रहा है। चंदन सिंह ने पत्र में लिखा है कि कुलपति महोदय ने आते ही सबसे पहले सरकार पर आरोप लगाया की उन्होंने सरकार काम नहीं करने दे रही वहीं छात्र संघ के नेता उनसे अनुचित मांग करते हैं उनसे ठेका माँगते हैं,कई पत्रकारों के पूछने पर भी उन्होंने ना ही छात्र नेताओं का नाम लिया ना ही किसी संगठन का ही नाम बताये।उन्हें अपनी जाति के लोगों को फायदा पहुंचाना था और उस ओर से ध्यान भटकाना था,उन्होंने आते ही पहले से प्रॉक्टर और डीन के पद पर बैठे मिथलेश कुमार सिंह को भद्रकाली महाविद्यालय का सचिव नियुक्त कर दिया। राजभवन के एक व्यक्ति एक पद के आदेश के बाद भी इनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और पुनः मिथलेश सिंह को सी.सी.डी.सी भी बना दिया।ज्ञात हो कि मिथलेश सिंह इनके स्वजाति के हैं। इन्होंने बिना राजभवन के आदेश के जेपीएससी से कुलसचिव के अनुशंसा के बाद भी अनुशंसित को कुलसचिव नहीं बनाते हुए अपने करीबी डॉ.सादिक रज़ाक को सेवा विस्तार देने का काम किया और 23/12/25 को कुलाधिपति के उपस्थिति में दीक्षांत समारोह में वैसे कुलसचिव से ही अगुवाई करवाने का काम भी किया।चन्दन सिंह ने बताया कि अख़बार के माध्यम से ज्ञात हुआ की डॉ.सादिक रज़ाक ने पूर्व में ही कुलसचिव के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था परंतु इसकी अधिसूचना 23/12/25 को जारी की गई।लेकिन इसका उल्लेख डॉ.रज़ाक के द्वारा जारी ख़ुद को हटा कर डॉ.कुमार विकाश को कुलसचिव बनाने वाले पत्र में अंकित नहीं किया गया।कुलपति के इस निर्णय से छात्रों के बीच काफ़ी नाराज़गी है की जहाँ दीक्षांत समारोह में डॉ.सादिक़ रज़ाक ने आपकी अगुवाई की,डिग्री पर हस्ताक्षर किये तो उस दिन कुलसचिव के पद पर था कौन कहीं इनकी डिग्रियाँ अवैध तो घोषित नहीं कर दीं जायेंगी। पत्र में सिंह ने लिखा है कि कुलपति महोदय ने जातीय भेदभाव की हद तो तब कर दि जब सीनियर होने के बावजूद एक आदिवासी असिस्टेंट रजिस्टर अनिल उराओं के रहते डॉ. कुमार विकाश को कुलसचिव का प्रभार दे दिया।इस प्रभार के लिए भी राजभवन से कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुआ।जातीय भेद भाव के आधार पर पूर्व में भी इनके द्वारा संजीत पासवान नाम के कर्मी का अंतर विश्वविद्यालय स्थानांतरण कर दिया गया वो भी बिना राजभवन के अनुमति के,यहाँ तक की इस स्थानांतरण की प्रति भी राजभवन को उपलब्ध नही कराई गई।वहीं यह यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। पत्र में बताया गया है कि कुलपति अपने छोटे से ही कार्यकाल के दौरान किए कई निविदाओं में भारी अनियमितता बरती है।जहाँ दीक्षांत समारोह में पैसे का दुरुपयोग और लूट किया गया है वही यूथ फ़ेस्टिवल में भी लाखों की लूट और निविदा में भारी धाँधली की गई है और वहाँ भी इन्होंने अपने स्वजातियों को अवैध तरीके से फ़ायदा पहुंचाने का काम किया है और बिना निविदा के दीक्षांत समारोह में कई कार्य आवंटित किए कुलपति के द्वारा पूर्व में राजभवन के आदेश की जिसमे पुर्व के कुलपति से चौवालिस लाख रुपये की वसूली के मामले को भी दबाने का काम किया है जिससे विश्वविद्यालय की छवि धूमिल हुई है। विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले किसी भी कार्यक्रम में कुलपति ने जनप्रतिनिधियो का मान नहीं रखा किसी भी कार्यक्रम में हजारीबाग या आस पास के जिले के किसी भी जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति इनके द्वारा जनप्रतिनिधियो को नहीं दी गई सम्मान को दर्शाता है।कई जनप्रतिनिधियों ने खुल कर इनका विरोध भी किया है।जबकि एक जनप्रतिनिधि ने तो इनके खिलाफ अवमानना का मामला विधान सभा में भी दर्ज करवा है और उसकी सुनवाई जारी है। पत्र में चंदन सिंह ने निवेदन किया है कि इनके पूरे कार्यकाल की जांच हो और इस दरमियान इन्हें या तो इन्हें निलंबित किया जाए या छुट्टी पर भेज दिया जाए।पत्र की प्रति माननीय मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा मंत्री को भी भेजी गई है।



