असम

असम में वन संरक्षण बल की चुनावी ड्यूटी में तैनाती पर रिटायर्ड IAS-IFS अधिकारियों का विरोध

ECI दिशानिर्देशों का उल्लंघन। 

 नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो 

असम सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के विशेष मुख्य सचिव एम के यादव (जिन्हें असम कैबिनेट द्वारा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के विशेष मुख्य सचिव के रूप में अस्थायी रूप से नियुक्त किया गया था) द्वारा 19 मार्च 2026 को जारी आदेश पर रिटायर्ड IAS और IFS अधिकारियों तथा वन संरक्षणवादियों ने गंभीर आपत्ति जताई है। इस आदेश में असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स (AFPF) के लगभग 1600 कर्मियों को आगामी चुनाव ड्यूटी पर तैनात करने का निर्देश दिया गया है, जो चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ECI) के स्पष्ट दिशानिर्देशों तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। रिटायर्ड अधिकारियों के समूह ने मुख्य सचिव, असम सरकार; मुख्य निर्वाचन अधिकारी/कमिश्नर, असम तथा विशेष मुख्य सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को पत्र लिखकर इस आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में मीना गुप्ता IAS (सेवानिवृत्त), पूर्व सचिव, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय; डॉ. ए.के. झा IFS (सेवानिवृत्त), पूर्व PCCF महाराष्ट्र; डॉ. उमा शंकर सिंह IFS (सेवानिवृत्त), पूर्व PCCF उत्तर प्रदेश; प्रेरणा सिंह बिंद्रा, पूर्व सदस्य, स्टैंडिंग कमिटी नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ; देबादित्यो सिन्हा, वन्यजीव संरक्षणवादी एवं विधि-नीति विश्लेषक तथा प्राकृति श्रीवास्तव IFS (सेवानिवृत्त), पूर्व PCCF केरल शामिल हैं। प्राकृति श्रीवास्तव ने सह-हस्ताक्षरकर्ताओं की ओर से पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। पत्र में कहा गया है कि ECI के दिशानिर्देशों के अनुसार, क्षेत्रीय वन बलों तथा सेवारत वन अधिकारियों—जिसमें वरिष्ठ IFS अधिकारी भी शामिल हैं—को चुनाव संबंधी ड्यूटी पर नहीं लगाया जा सकता। ये निर्देश वन संरक्षण एवं प्रबंधन के महत्वपूर्ण कार्यों को किसी भी समय बाधित न होने देने के लिए हैं। AFPF की तैनाती असम के वैश्विक महत्व के वन्यजीवों के संदर्भ में विशेष रूप से चिंताजनक है, जहां लुप्तप्राय भारतीय गैंडे की सबसे बड़ी आबादी काजीरंगा नेशनल पार्क जैसे संरक्षित क्षेत्रों में है।असम में हूलॉक गिबन (भारत की एकमात्र वानर प्रजाति), गोल्डन लंगूर, पिग्मी हॉग, हाथी तथा बाघ जैसे प्रतीकात्मक एवं लुप्तप्राय प्रजातियां प्रमुख रूप से पाई जाती हैं। AFPF कर्मियों की चुनाव ड्यूटी पर तैनाती से जमीनी स्तर पर संरक्षण तंत्र कमजोर हो जाएगा, जिससे संगठित वन्यजीव अपराधियों के लिए खतरा बढ़ेगा। पत्र में चेतावनी दी गई है कि शिकारियों एवं अतिक्रमणकारियों के हवाले हो जाएंगे ये क्षेत्र। इसके अलावा, भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 15 मई 2024 के आदेश में वन अधिकारियों एवं विभागीय वाहनों को चुनाव ड्यूटी से स्पष्ट रूप से छूट दी है। अदालत ने निर्देश दिया था कि सभी राज्यों में वन कर्मी तथा वन वाहन चुनाव उद्देश्यों या चार धाम यात्रा जैसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए अधिग्रहीत न किए जाएं।” इस न्यायिक निर्देश के विपरीत कोई प्रशासनिक कार्रवाई गंभीर कानूनी एवं संवैधानिक चिंताएं पैदा करती है। पत्र में मांग की गई है कि:19 मार्च 2026 के विवादास्पद आदेश को तत्काल वापस लिया जाए। भविष्य में ECI दिशानिर्देशों तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। सेवानिवृत्त अधिकारियों ने चेताया है कि यह कदम वन एवं वन्यजीव संरक्षण को कमजोर करेगा, राज्य सरकार को न्यायिक जांच के दायरे में लाएगा तथा वैधानिक सुरक्षा एवं संस्थागत अखंडता की उपेक्षा का खतरनाक उदाहरण स्थापित करेगा। उन्होंने कहा, “यह मामला प्रशासनिक अतिक्रमण रोकने, कानून का शासन बनाए रखने तथा वनों, वन्यजीवों एवं उनके आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल ध्यान की मांग करता है।”असम में चुनावी तैयारियों के बीच यह विवाद वन संरक्षण और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बीच संतुलन की चुनौती को रेखांकित करता है। विभाग से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है लेकिन सेवानिवृत्त अधिकारियों ने आशा जताई कि सरकार के उच्च अधिकारियों द्वारा जल्द इसपर विचार करते हुए भारत के चुनाव आयोग (ECI) के स्पष्ट दिशानिर्देशों तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का प्रत्यक्ष उल्लंघन नहीं करेंगे और ऐसे निर्णय को खारिज करेंगे।

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