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370 हटाकर आतंकवाद-अलगाववाद की कमर तोड़ी

रेड कॉरिडोर खत्म कर देश को नक्सल मुक्त कराया... अमित शाह का जवाब नहीं

नई दिल्ली : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जिस तरह से सुरक्षा बलों को खुली छूट दी, राज्यों के साथ समन्वय स्थापित किया और विकास को सुरक्षा के साथ जोड़ा, वह इस सफलता का असली सूत्र है। उनकी कार्यशैली में एक खास बात है निर्णायकता।
भारत के इतिहास में एक ऐसा अध्याय आखिरकार समाप्ति की कगार पर पहुंच चुका है, जिसने छह दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा को लहूलुहान किया, विकास को बंधक बनाया और अनगिनत जिंदगियों को निगल लिया। यह अध्याय है नक्सलवाद का, जिसकी शुरूआत उत्तर बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी में हुई थी और जिसने धीरे धीरे पूरे देश में अपने हिंसक पंजे फैला दिए थे। अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विभिन्न राज्यों में नक्सलवाद के खिलाफ चलाये गए अभियानों की सफलता को रेखांकित करते हुए कहा, हम ऐसा कह सकते हैं कि हम नक्सल मुक्त हो गए हैं। उन्होंने कहा कि माओवादियों की शीर्ष इकाई और केंद्रीय ढांचा लगभग पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है। इस तरह लाल आतंक लगभग खत्म हो चुका है और देश नक्सल मुक्त होने की ओर निर्णायक कदम बढ़ा चुका है।
देखा जाये तो गृह मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभालने के बाद अमित शाह ने जो निर्णायक कदम उठाए, उन्होंने देश की सुरक्षा तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर उन्होंने दशकों से जमे आतंकवाद और अलगाववाद की जड़ पर सीधा प्रहार किया, पत्थरबाजी जैसी घटनाएं समाप्त कर दीं और वहां शांति और विकास का नया दौर शुरू हुआ। अब जब रेड कॉरिडोर भी समाप्ति की कगार पर है, तो यह साफ है कि अमित शाह के नेतृत्व और मोदी सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति ने देश की आंतरिक सुरक्षा को अभूतपूर्व मजबूती दी है।
हम आपको याद दिला दें कि नक्सलवाद की शुरूआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी, जब एक किसान विद्रोह ने हिंसक रूप ले लिया। चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल जैसे नेताओं के नेतृत्व में यह आंदोलन शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष के जरिए व्यवस्था को उखाड़ फेंकना था। शुरूआत में यह जमींदारों के खिलाफ था, लेकिन जल्द ही यह एक खतरनाक विचारधारा में बदल गया जिसने युवाओं को भी अपनी ओर आकर्षित किया।
देखते ही देखते यह आग बिहार, ओडिशा, झारखंड और देश के कई हिस्सों में फैल गई थी। समय के साथ यह तथाकथित लाल गलियारा बन गया, जो कर्नाटक से लेकर नेपाल तक फैला हुआ था। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल इसके प्रमुख केंद्र बन गए थे। कर्नाटक में भी नक्सलवाद ने तीन दशक तक आतंक फैलाया। लेकिन सख्त पुलिस कार्रवाई, आत्मसमर्पण नीति और पुनर्वास कार्यक्रमों ने इसे पूरी तरह खत्म कर दिया। 2025 तक यह राज्य आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित हो गया।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की कहानी और भी खतरनाक रही। यहां लैंडमाइन धमाके, पुलिस अधिकारियों की हत्या और बड़े पैमाने पर हिंसा आम बात बन गई थी। लेकिन ग्रेहाउंड बल की स्थापना, लगातार अभियान और सटीक खुफिया रणनीति ने इस नेटवर्क की कमर तोड़ दी। 2025 में शीर्ष नक्सली नेताओं के मारे जाने और आत्मसमर्पण की लहर ने इस आंदोलन को लगभग समाप्त कर दिया।
छत्तीसगढ़, जो कभी नक्सलवाद का सबसे बड़ा गढ़ था, वह आज विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर जैसे इलाके, जहां कभी सरकार की पहुंच नहीं थी, अब वहां सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों का निर्माण हो रहा है। आॅपरेशन ग्रीन हंट और बाद में ब्लैक फॉरेस्ट जैसे अभियानों ने नक्सलियों के सबसे मजबूत नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया।
बस्तर, जिसे लाल आतंक का दिल कहा जाता था, आज उस साये से बाहर निकल चुका है। अमित शाह ने जिस आत्मविश्वास के साथ कहा कि बस्तर अब नक्सलवाद से मुक्त है, वह केवल बयान नहीं बल्कि जमीनी हकीकत है।
वहीं मध्य प्रदेश में हॉक फोर्स ने निर्णायक भूमिका निभाई और नक्सलियों के ठिकानों को एक एक कर खत्म किया। बिहार और झारखंड, जो कभी सबसे ज्यादा प्रभावित थे, वहां भी स्थिति में भारी सुधार हुआ है। बेहतर पुलिसिंग, विकास योजनाएं और राजनीतिक इच्छाशक्ति ने इस समस्या को जड़ से कमजोर किया। केरल में भी नक्सल गतिविधियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं। पुनर्वास नीति और सख्त कार्रवाई ने वहां इस विचारधारा को टिकने नहीं दिया। नेपाल में भी माओवादी हिंसा का अंत 2006 के शांति समझौते के साथ हुआ, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर भी इस नेटवर्क को बड़ा झटका लगा।
पूरे घटनाक्रम को देखें तो स्पष्ट होता है कि यह जीत अचानक नहीं मिली है। इसके पीछे वर्षों की रणनीति, लगातार अभियान, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सबसे महत्वपूर्ण नेतृत्व की स्पष्ट दिशा है। अमित शाह ने जिस तरह से सुरक्षा बलों को खुली छूट दी, राज्यों के साथ समन्वय स्थापित किया और विकास को सुरक्षा के साथ जोड़ा, वह इस सफलता का असली सूत्र है। उनकी कार्यशैली में एक खास बात है निर्णायकता। वह केवल योजनाएं नहीं बनाते, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारकर परिणाम भी सुनिश्चित करते हैं। यही कारण है कि आज नक्सलवाद जैसी जटिल समस्या भी समाप्ति की ओर है। अमित शाह की कार्यशैली में जो स्पष्टता, दृढ़ता और परिणाम देने की क्षमता दिखती है, वही इस ऐतिहासिक उपलब्धि की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का उनका संकल्प आज जमीन पर साकार होता दिखाई दे रहा है।
बहरहाल, अब जब लाल आतंक का साया हट चुका है, तो देश के उन इलाकों में विकास की नई सुबह हो रही है, जो दशकों तक पिछड़ेपन और भय में जीते रहे। सड़कों का जाल बिछ रहा है, स्कूल खुल रहे हैं, निवेश आ रहा है और सबसे बड़ी बात लोगों के चेहरों पर डर की जगह उम्मीद दिखाई दे रही है। यह केवल सुरक्षा की जीत नहीं है, यह भारत की लोकतांत्रिक ताकत, विकास मॉडल और मजबूत नेतृत्व की जीत है। और इस जीत के केंद्र में खड़े हैं अमित शाह, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादा मजबूत हो, रणनीति स्पष्ट हो और नेतृत्व दृढ़ हो, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं रहती।

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