गाजियाबाद

लोनी की सियासत में अंदरूनी घमासान तेज

टिकट से पहले जातीय समीकरणों की बिसात बिछनी शुरू

जनता की नाराजगी, नेताओं की बयानबाज़ी और संगठन तक पहुंची शिकायतों ने बढ़ाई लोनी में हलचल
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ लोनी की राजनीति अब धीरे धीरे गर्माने लगी है। क्षेत्र में जहां एक ओर संभावित दावेदार जनता के बीच पहुंच कर उसका मन टटोलने में लगे हुए हैं वहीं दूसरी और उन्हें अपने साथ लाकर अपनी पकड़ मजबूत करने में  भी जुटे हैं,  लोनी में सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओ के अंदर ही अंदर उठ रही असंतोष की लहर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बनी हुई है।
सूत्रों की मानें तो लोनी से जुड़े कुछ मामलों की गूंज जिलाधिकारी कार्यालय से होते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री और संगठन स्तर तक पहुंच चुकी है।  राजनीतिक लोगों के बीच  चर्चाओं यह मुद्दा तेजी से तैर रहा है। इसके अलावा यह भी चर्चा है कि क्षेत्र में बढ़ती जनसमस्याओं, आपसी खींचतान और संगठनात्मक असंतोष को लेकर लगातार फीडबैक ऊपर तक पहुंच रहा है।
सोशल मीडिया की राजनीति से जनता तक पहुंचने की कोशिश
अपनी तीखी बयानबाज़ी और आक्रामक शैली को लेकर हमेशा चर्चा में रहने वाले वर्तमान विधायक अब सोशल मीडिया के जरिए जनता से सीधे संवाद साधने व बने रहने की कोशिश कर रहे हैं।
फेसबुक पोस्ट, वीडियो संदेश और लाइव प्रसारणों के माध्यम से क्षेत्रीय मुद्दों पर सक्रियता इसके उदाहरण है, लेकिन जमीनी स्तर पर फैली समस्याओं का समाधान अब भी लोगों की सबसे बड़ी मांग बना हुआ है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बदलते माहौल में विधायक “डिजिटल जनसंपर्क” के जरिए अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने की रणनीति पर लगातार काम कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने अपना आवास भी अब लोनी में बना लिया है ताकि जनता से नजदीकी बनी रहे।लेकिन दूसरी तरफ क्षेत्र में बढ़ रही नाराजगी और जातीय समीकरणों की चुनौती उनके लिए आसान नहीं दिखाई दे रही।
त्यागी, और ब्राह्मण समीकरण बना रहे दबाव
लोनी की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा अंदरखाने पनप रहे जातीय असंतोष की हो रही है। सूत्र बताते हैं कि त्यागी,  और ब्राह्मण समाज के लोगों में नाराजगी का माहौल बना हुआ है, त्यागी समाज मीरपुर हिंदू में बनने वाले डंपिंग ग्राउंड से सरकार नाराज़ दिखाई पड रहा है जो आने वाले चुनाव में बड़ा असर डाल सकता है।
हालांकि सार्वजनिक मंचों पर कोई खुलकर सामने नहीं आ रहा, लेकिन राजनीतिक बैठकों और सामाजिक आयोजनों में यह मुद्दा हमेशा चर्चा का विषय बना हुआ है। कई स्थानीय कार्यकर्ता भी मानते हैं कि यदि समय रहते इन समीकरणों को साधा नहीं गया तो लोनी की चुनावी राह भाजपा के लिए कठिन हो सकती है।
पूर्व ब्लाक प्रमुख अनिल कसाना की क्षेत्र में सक्रियता ने बढ़ाई लोनी क्षेत्र में हलचल
इधर पूर्व ब्लॉक प्रमुख अनिल कसाना लगातार क्षेत्र में सक्रिय रुप से दिखाई दे रहे हैं। युवाओं, सामाजिक कार्यक्रमों और घरेलू आयोजनों में उनकी बढ़ती मौजूदगी को भाजपा की अंदरूनी राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
समर्थकों के साथ बैठकों के जरिए वह जनता का मूड भांपने और समझने तथा उनकी समस्याओं के निराकरण को लेकर अपनी रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कसाना समर्थक इस बार संगठन के सामने मजबूत दावेदारी पेश करने की तैयारी में हैं।
RLD भी ठोक रही है लोनी में अपनी मजबूत दावेदारी
वहीं राष्ट्रीय लोकदल भी लोनी सीट पर अपनी संभावनाएं तलाशने में जुटा हुआ है। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर पालिका अध्यक्ष पद पर रंजीता धामा की जीत ने यह साबित कर दिया था कि तमाम विरोधी समीकरणों के बावजूद रालोद की पकड़ लोनी क्षेत्र में अभी भी बनी हुई है।
रालोद कार्यकर्ता गांवों और कॉलोनियों में लगातार बैठकें कर माहौल बनाने में लगे हैं। पार्टी का मानना है कि यदि जनता की नाराजगी इसी तरह बनी रही और यह मामला लखनऊ तक पहुंचा तो विधानसभा चुनाव में गठबंधन के तहत यह सीट उनके खाते में आ सकती है।
जनता जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछ रही  विकास कहां हुआ है?
लोनी की जनता आज भी जलभराव, गंदगी, धूल, जाम और बिजली कटौती जैसी समस्याओं से लगातार जूझ रही है।
दिल्ली-सहारनपुर रोड पर उड़ती धूल, लोनी बॉर्डर की नहर में गंदगी, बथला रोड पर नालों का ओवरफ्लो और अधूरे पड़े सीवर कार्य लोगों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
लोगों का कहना है कि सोशल मीडिया पर जनप्रतिनिधियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति खूब हो रही है, लेकिन धरातल पर समस्याओं का समाधान कुछ नहीं दिख रहा। जनता अब यह सवाल पूछने लगी है कि आखिर “लोनी को लंदन बनाने” के दावे सिर्फ पोस्टरों और भाषणों तक ही सीमित क्यों हैं।
2027 में दिख सकता है बड़ा राजनीतिक उलटफेर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार लोनी विधानसभा चुनाव केवल पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों, जातीय समीकरणों और जनसंपर्क की ताकत पर लड़ा जाएगा।
जनता का बढ़ता असंतोष और नेताओं के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान आने वाले समय में बड़े राजनीतिक बदलाव की जमीन तैयार कर सकती है।
फिलहाल लोनी की राजनीति में टिकट की दौड़, संगठन की नजर, जातीय समीकरण और जनता की नाराजगी  सभी मिलकर चुनावी तापमान को लगातार बढ़ाते नजर आ रहे हैं
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