बागपत

माया त्यागी कांड: जब बागपत के चौराहे पर चीख उठी थी इंसानियत

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत। 18 जून 1980 की वह तपती दोपहर आज भी बागपत, बड़ौत और छपरौली की फिजाओं में एक खौफनाक सन्नाटा बनकर तैरती है. कहने को तो 46 साल बीत चुके हैं, समय की धूल ने कई यादों को धुंधला कर दिया है, लेकिन जब भी बागपत के चौपालों पर बुजुर्ग बैठते हैं, तो उनकी पथराई आंखें नम हो जाती हैं और रूह सिहर उठती है. यह सिर्फ एक पुलिसिया जुर्म की कहानी नहीं है, यह हमारी सामूहिक चुप्पी, हमारे लोकतंत्र के खोखलेपन और उस दौर के ग्रामीण समाज की छाती पर लगा एक ऐसा गहरा घाव है जो आज भी रिस रहा है.
दोपहर का वो खूनी मंजर और उजड़ता सुहाग
वह एक आम दोपहर थी, जब करीब एक बजे बागपत के मुख्य चौराहे पर एक सफेद एंबेसडर कार आकर रुकी. कार में ईश्वर त्यागी, माया त्यागी के पति राजेंद्र दत्त, उनके साथी सुरेंद्र सिंह और स्वयं तीन महीने की गर्भवती माया त्यागी सवार थीं—जो भारतीय नारीत्व और मातृत्व की जीती-जागती मूरत थीं.
लेकिन किसे पता था कि रक्षक ही भक्षक बनने वाले हैं? बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी सवाल-जवाब के, पुलिस ने तीनों पुरुषों को गोलियों से छलनी कर दिया. तड़तड़ाहट शांत हुई तो कार में बैठे तीनों पुरुषों के जिस्म बेजान हो चुके थे और तीनों की मौत हो गई थी. एक पल में तीन जिंदगियां खत्म हो गईं, एक मां की गोद सूनी हो गई, एक बहन का भाई छिन गया और एक गर्भवती पत्नी का सुहाग हमेशा के लिए उजड़ गया.
जब इंसानियत कांप उठी: बर्बरता की सारी हदें पार
परंतु, पुलिस की हैवानियत का वीभत्स रूप तो अभी सामने आना बाकी था. तीनों पुरुषों को मौत के घाट उतारने के बाद, उस असहाय, डरी हुई गर्भवती महिला को गाड़ी से बालों से खींचकर बाहर निकाला गया. उनके आंसुओं, उनकी चीखों और उनके गर्भ की भी कोई परवाह नहीं की गई. सरेराह, उस भरे चौराहे पर उनकी साड़ी फाड़ दी गई और उन्हें निर्वस्त्र करके लाठियों से बेरहमी से पीटा गया.
सोचिए उस मंजर को, जहां एक बेबस नारी अपनी अस्मत की भीख मांग रही थी, और समाज तमाशबीन बना खड़ा था—कुछ खौफ के मारे गूंगे हो गए थे, तो कुछ की चुप्पी में मौन सहमति थी. बाद में जब माया के शरीर की जांच हुई, तो उस पर 25 से अधिक चोटों के निशान थे, उनके गुप्तांगों पर ऐसी बर्बर चोटें थीं जिन्हें बयां करते हुए आज भी कलम कांप जाती है.
ओमवीर तोमर: खौफ के साए में साहस की एक अकेली आवाज
जब पूरा बाजार डर के मारे पीछे हट रहा था और पुलिस अपने पाशविक रवैये पर उतरी हुई थी, तब शिकोहपुर गांव के एक जांबाज युवक, ओमवीर तोमर का खून खौल उठा. वे मूक दर्शक नहीं बने रह सके. उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए पुलिस के सामने खड़े होकर पूरी ताकत से चिल्लाया:
“क्या यही न्याय है? क्या इसी दिन के लिए देश का संविधान लिखा गया था?”
माया त्यागी को बचाने की कोशिश में पुलिस की लाठियां उन पर भी टूटीं, उन्हें भी दमन और लाठियों का सामना करना पड़ा. उस समय तो उनकी आवाज दब गई, लेकिन इतिहास गवाह है कि उन्होंने इंसानियत का धर्म निभाया था. आज उसी चौराहे को ‘वंदना चौक’ के नाम से जाना जाता है, जो इस दर्द की गवाही देता है.
दिल्ली की संसद से लेकर गांवों के मोर्चों तक आक्रोश की गूंज
इस खौफनाक कांड की गूंज जब फैली, तो पूरे देश का दिल दहल गया. माताएं अपनी बेटियों को सीने से लगाकर रोने लगीं. दिल्ली, मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर की सड़कों पर जन-आक्रोश के समंदर उमड़ पड़े और मोर्चे निकले. महिला संगठनों ने अदालतों में जनहित याचिकाएं डालीं और बार काउंसिल ने स्वतः संज्ञान लिया.
 इस घटना की खबर किसानों के मसीहा और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह तक पहुंची, तो उनका सख्त चेहरा भी आंसुओं से भीग गया और उनकी आंखें नम हो गईं. उन्होंने संसद में दहाड़ते हुए आक्रोश की आवाज बुलंद की और कहा था:
“यह घटना पुलिस की बर्बरता नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र के गाल पर एक थप्पड़ है। अगर हमने इसे आज बर्दाश्त किया, तो कल कोई भी महिला सुरक्षित नहीं बचेगी।”
11 पुलिसकर्मियों को सजा और न्याय की अंतहीन लड़ाई
इस पूरे मामले के केंद्र में थे तत्कालीन विवादित पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर नरेंद्र सिंह (नरेंद्र गौड़). घटना के बाद पुलिसिया तंत्र के खिलाफ चारों तरफ आक्रोश था. बाद में इस मामले को लेकर 11 पुलिसकर्मियों पर केस चला. इन सभी दोषी पुलिसकर्मियों को कोर्ट ने सजा सुनाई.
कुछ समय बाद मुख्य आरोपी दरोगा नरेंद्र गौड़ की हत्या कर दी गई, जिसने क्षेत्र को एक बार फिर दहला दिया. इस हत्या का आरोप माया त्यागी के देवर विनोद त्यागी पर मढ़ा गया. अदालतों के चक्कर और कानूनी दांव-पेंच का एक लंबा दौर चला, लेकिन आखिरकार वर्ष 2009 में कोर्ट ने विनोद त्यागी को सभी आरोपों से बरी कर दिया और वे बाइज्जत रिहा हुए. पर सवाल फिर वही था—क्या यह न्याय था या फिर एक और लंबा अंधेरा?
इतिहास का वो पन्ना, जो आज भी गुमनामी में सुबक रहा है
समय का पहिया घूम गया, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन दर्द की शिद्दत कम नहीं हुई. आज माया त्यागी दिल्ली के किसी अनजाने, गुमनाम कोने में एक मां, एक औरत और एक जिंदा इतिहास बनकर अपने जख्मों से जिंदगी बुन रही हैं. आज भी जब कोई उनसे पूछता है, तो वे भर्राई आवाज में बस इतना ही कहती हैं:
“मुझे अब कुछ नहीं चाहिए… बस ये दुआ है—कोई और माया न बने। और अगर बने, तो चुप न रहे।”
“मैं बागपत हूँ…” आज भी यह मिट्टी उस दिन बहे बेगुनाहों के खून से लाल है. अदालतों के फैसले तो फाइलों में बंद होकर दफ्तरों की धूल फांक रहे हैं, लेकिन बागपत के लोगों के दिलों में दर्ज यह दर्द आज भी हमसे चीख-चीखकर एक ही सवाल पूछता है—क्या तुम इस दर्द को महसूस कर मेरा चेहरा पोंछोगे, या फिर चुपचाप आगे गुजर जाओगे?
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