बागपत
चालान नहीं, समाधान दीजिए: गलती पर जुर्माने के बजाय सुरक्षा का सामान क्यों नहीं?
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत। सड़क सुरक्षा के नाम पर यातायात नियम तोड़ने वालों का चालान काटना जरूरी है, लेकिन क्या केवल जुर्माना वसूल लेने से समस्या खत्म हो जाती है? अगर कोई व्यक्ति बिना हेलमेट पकड़ा जाता है और उससे ₹500 का चालान लिया जाता है, तो क्यों न उसी ₹500 के आसपास की कीमत का मानक हेलमेट उसे दे दिया जाए?
यानी दंड भी हो और सुधार भी।
हेलमेट नहीं तो चालान की जगह हेलमेट
मान लीजिए कोई बाइक चालक बिना हेलमेट पकड़ा गया। उससे ₹500 या निर्धारित जुर्माना लेने के बजाय उसे एक अच्छा, मानक हेलमेट उपलब्ध कराया जाए और उसकी कीमत जुर्माने के रूप में दर्ज की जाए।
इससे सरकार को भी राजस्व का उद्देश्य पूरा करने के साथ-साथ सड़क सुरक्षा का वास्तविक लाभ मिलेगा और चालक के सिर पर सुरक्षा भी होगी।
एक चालान = एक सुरक्षित सिर।
इंश्योरेंस नहीं है तो बीमा की सुविधा
इसी तरह किसी वाहन का वैध इंश्योरेंस नहीं है तो केवल चालान काटकर छोड़ने के बजाय, जहां कानूनी और प्रशासनिक रूप से संभव हो, ऑन-द-स्पॉट बीमा सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो। वाहन मालिक निर्धारित प्रीमियम देकर अपना बीमा करा सके और नियमों का पालन सुनिश्चित हो।
प्रदूषण प्रमाणपत्र नहीं है तो PUC की सुविधा
यदि वाहन का वैध प्रदूषण प्रमाणपत्र (PUC) नहीं है, तो केवल जुर्माना लगाने की बजाय अधिकृत व्यवस्था के माध्यम से तुरंत प्रदूषण जांच की सुविधा उपलब्ध कराई जाए। वाहन मानकों पर खरा उतरता है तो प्रमाणपत्र जारी हो, और प्रदूषण अधिक हो तो वाहन मालिक को सुधार की दिशा में भेजा जाए।
सीट बेल्ट नहीं लगाई तो जागरूकता के साथ कार्रवाई
कार चालक सीट बेल्ट के बिना पकड़ा जाता है तो जुर्माने के साथ उसे मौके पर सड़क सुरक्षा संबंधी संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया जा सकता है। उद्देश्य यह हो कि अगली बार वह सीट बेल्ट केवल चालान से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जान बचाने के लिए लगाए।
वाहन की लाइट, इंडिकेटर या रिफ्लेक्टर खराब है तो?
छोटी तकनीकी कमियों पर केवल चालान करने की बजाय अधिकृत स्थानों पर ऑन-द-स्पॉट सुधार/फिटनेस सहायता की व्यवस्था हो। जैसे खराब इंडिकेटर, रिफ्लेक्टर या अन्य छोटी सुरक्षा कमी को वहीं ठीक कराया जा सके।
नाबालिग ड्राइविंग पर सख्ती, लेकिन परिवार को भी शिक्षा
नाबालिग वाहन चलाते पकड़ा जाए तो मामला केवल चालान तक सीमित न रहे। अभिभावक को बुलाकर सड़क सुरक्षा पर अनिवार्य काउंसलिंग कराई जाए और कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई भी हो।
तेज रफ्तार पर सिर्फ जुर्माना क्यों?
ओवरस्पीडिंग करने वाले चालक को जुर्माने के साथ अनिवार्य ट्रैफिक सेफ्टी क्लास दी जा सकती है। उसे समझाया जाए कि तेज गति कुछ मिनट बचा सकती है, लेकिन दुर्घटना जिंदगी भर छीन सकती है।
गलत पार्किंग पर समाधान भी
जहां संभव हो, गलत पार्किंग पर केवल चालान काटने के बजाय चालक को नजदीकी वैध पार्किंग स्थल की जानकारी दी जाए और शहरों में पार्किंग व्यवस्था मजबूत की जाए।
चालान व्यवस्था को ‘सुधार व्यवस्था’ बनाने की जरूरत
यह विचार चालान खत्म करने की बात नहीं करता। गंभीर और जानबूझकर किए गए यातायात उल्लंघनों पर कानून के मुताबिक जुर्माना और दंड जरूरी है।
लेकिन छोटे और सुधार योग्य उल्लंघनों में ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें व्यक्ति से लिया गया पैसा सुरक्षा, अनुपालन और सुधार में ही वापस दिखाई दे।
कल्पना कीजिए—
बिना हेलमेट → हेलमेट
बिना PUC → प्रदूषण जांच/प्रमाणपत्र
बिना बीमा → बीमा अनुपालन की सुविधा
सीट बेल्ट नहीं → सुरक्षा प्रशिक्षण
खराब लाइट/इंडिकेटर → सुधार सुविधा
ओवरस्पीडिंग → सुरक्षा प्रशिक्षण + कानूनी कार्रवाई
नाबालिग ड्राइविंग → अभिभावक काउंसलिंग + कानूनी कार्रवाई
इससे चालान केवल सरकारी खजाने में जमा होने वाला पैसा नहीं रहेगा, बल्कि सड़क सुरक्षा में दिखाई देने वाला निवेश बन सकता है।
एक नई सोच
सरकार यदि इस मॉडल पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू करे तो कुछ चुनिंदा शहरों में इसका परीक्षण किया जा सकता है। इससे पता चलेगा कि जुर्माना वसूलने की तुलना में मौके पर सुधार कराने से सड़क दुर्घटनाओं और यातायात उल्लंघनों में कितना फर्क पड़ता है।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने चालान काटे गए?
असली सवाल होना चाहिए—
कितने लोग सुरक्षित हुए?
कितने वाहन नियमों के अनुरूप हुए?
कितनी दुर्घटनाएं रोकी गईं?
चालान से सरकार को पैसा मिल सकता है, लेकिन सही समय पर दिया गया हेलमेट किसी परिवार को अपना कमाने वाला सदस्य खोने से बचा सकता है।
इसलिए जरूरत है—“चालान काटो” से आगे बढ़कर “गलती सुधारो और सुरक्षा दो” की सोच अपनाने की।



