
नई दिल्ली। राजस्थान का दक्षिणी हिस्सा बांसवाड़ा जिला यहां माही नदी के किनारे भारत अपना सबसे महत्वाकांक्षी परमाणु बांसवाड़ा प्रोजेक्ट बना रहा है। अब यह प्रोजेक्ट क्यों खास है? यह जान लीजिए। इसकी कुल क्षमता 2800 मेगावाट है। रिएक्टर्स की बात करें तो इसमें 700 से 700 मेगावाट के चार बड़े रिएक्टर्स लगाए जाएंगे। लागत 28000 करोड़ से भी ज्यादा का टेंडर है। यह भारत के परमाणु इतिहास का अब तक का ऊर्जा केंद्र स्थापित कर रहा है। इस प्रोजेक्ट की ताकत को समझिए। राजस्थान का माही सबसे बड़ा कंस्ट्रक्शन पैकेज है।
क्या आपने कभी सोचा है कि एक अकेला फैसला पूरी दुनिया के पावर सेक्टर की तस्वीर बदल सकता है? आज भारत ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया जिसने पश्चिमी देशों से लेकर हमारे पड़ोसियों तक खासतौर से चीन सबके होश उड़ा दिए हैं। यह खबर किसी मामूली टेंडर की नहीं है। यह खबर है भारत के इतिहास के सबसे बड़े सबसे डेरिंग और सबसे विशाल न्यूक्लियर प्रोजेक्ट की। भारत सरकार ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा न्यूक्लियर ईपीसी टेंडर ल्च कर दिया है। 2800 मेगावाट का यह प्रोजेक्ट राजस्थान के माही बांसवाड़ा में लगने जा रहा है। लेकिन यह सिर्फ पैसों या बिजली की बात नहीं है। यह भारत की न्यूक्लियर संप्रभुता की कहानी है। राजस्थान का दक्षिणी हिस्सा बांसवाड़ा जिला यहां माही नदी के किनारे भारत अपना सबसे महत्वाकांक्षी परमाणु बांसवाड़ा प्रोजेक्ट बना रहा है। अब यह प्रोजेक्ट क्यों खास है? यह जान लीजिए। इसकी कुल क्षमता 2800 मेगावाट है। रिएक्टर्स की बात करें तो इसमें 700 से 700 मेगावाट के चार बड़े रिएक्टर्स लगाए जाएंगे। लागत 28000 करोड़ से भी ज्यादा का टेंडर है। यह भारत के परमाणु इतिहास का अब तक का ऊर्जा केंद्र स्थापित कर रहा है। इस प्रोजेक्ट की ताकत को समझिए। राजस्थान का माही सबसे बड़ा कंस्ट्रक्शन पैकेज है। आज तक भारत ने कभी भी एक साथ इतने बड़े स्तर पर टेंडर जारी नहीं किया है। यह दिखाता है कि भारत अब धीमी गति वाले मोड़ से निकलकर फास्ट फॉरवर्ड मोड में आ गया है। अनुशक्ति विद्युत निगम लिमिटेड का ये जॉइंट वेंचर है भारत की दो दिग्गज कंपनियों के बीच एनपीसीआईएल न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया जिनके पास न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी की दशकों की महारत है। एनटीपीसी लिमिटेड जो बड़े प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने और उन्हें मैनेज करने में भारत के बेताज बादशाह हैं। इसमें एनपीसीआईएल की मेजॉरिटी हिस्सेदारी है और 49% एनटीपीसी के पास है। सरकार ने इन दोनों को इसलिए साथ लाया ताकि तकनीक और एग्जीक्यूशन का ऐसा मेल बने कि प्रोजेक्ट समय से पहले पूरा हो सके। इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी और सबसे गर्व वाली बात जानते हैं क्या? वो यह है कि इनके चारों रिएक्टर्स इंडीजीनियस बिल्ड यानी कि पूरी तरह स्वदेशी होंगे। भारत ने रूस, अमेरिका या फ्रांस के सामने हाथ नहीं फैलाया। भारत अब अपनी खुद की तकनीक का इस्तेमाल करेगा जिसे पीएच डब्ल्यूआर कहा जाता है। यह वही तकनीक है जिसे भारत ने गुजरात के काकरा पार और राजस्थान के रावत भाटा में टेस्ट किया और सफल भी पाया। अब भारत इसे फ्लीट मोड में इस्तेमाल कर रहा है। मतलब एक ही डिजाइन, एक ही सप्लायर और मास प्रोडक्शन। इससे समय बचता है, लागत कम होती है और यह प्रोजेक्ट एक और वजह से डेरिंग है।
पहली बार भारत इतने बड़े स्केल पर प्राइवेट प्लेयर्स को न्यूक्लियर सेक्टर में इनवाइट कर रहा है। अडानी ग्रुप से लेकर वेदता तक भारत के बड़े उद्योगपति अब देश की न्यूक्लियर एनर्जी निवेश करने के लिए कतार में हैं। अभी तक परमाणु ऊर्जा सिर्फ सरकारी नियंत्रण में थी। लेकिन अब सरकार को समझ में आ गया है कि अगर 100 गीगावाट का लक्ष्य पाना है तो प्राइवेट सेक्टर की पूंजी और उनकी तेज गति की जरूरत पड़ेगी। भारत के इरादे साफ हैं। पिछले एक साल में भारत ने जो कदम उठाए हैं, वह किसी मास्टर प्लान से कम नहीं है। कनाडा और आॅस्ट्रेलिया से यूरेनियम डील से ईंधन की चिंता यहां पर खत्म हो जाती है। दूसरा दूसरा स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर यानी एसएमआर जो तारापुर और वाईजेक में छोटे रिएक्टर्स की तैयारी कर रहा है। तीसरा है नीति में बदलाव।
दशकों लगने वाले काम को अब सालों में समेटा जा रहा है। चीन ने अपनी न्यूक्लियर एनर्जी को जिस तरह से बूस्ट किया है, भारत भी अब उसी रास्ते पर है, लेकिन अपनी स्वदेशी तकनीक के दम पर भारत आगे बढ़ रहा है। यह प्रोजेक्ट सिर्फ बिजली पैदा नहीं करेगा। यह लाखों नौकरियां पैदा करेगा और राजस्थान की इकॉनमी को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। खैर माही बांसवाड़ा का यह प्रोजेक्ट सिर्फ सीमेंट और कंक्रीट का ढांचा नहीं है।



