ललितपुर
सलिल चौधरी, जिनकी धुनों में धड़कता था जीवन का संगीत : सिद्धार्थ शर्मा
लोकधुनों की मिट्टी से लेकर पश्चिमी सिम्फनी और हार्मनी तक को भारतीय संवेदना में पिरोने वाले प्रयोगधर्मी संगीतकार

5 सितम्बर पुण्यतिथि विशेष
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
ललितपुर। हिंदी सिनेमा के संगीत संसार में सलिल चौधरी का नाम उन विरल संगीतकारों में लिया जाता है, जिन्होंने धुनों को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उनमें जीवन, समाज, प्रकृति, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को स्वर दिया। 5 सितम्बर 1995 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संगीत आज भी उतनी ही ताजगी के साथ श्रोताओं के दिलों में मौजूद है। सलिल चौधरी की संगीत शैली की सबसे बड़ी खासियत भारतीय लोकधुनों, शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी सिम्फनी, हार्मनी व काउंटरपॉइंट का अनूठा संगम था। उन्होंने लोकसंगीत को आधुनिक वाद्य-संयोजन के साथ प्रस्तुत कर उसे नई ऊंचाई दी। फिल्म मधुमती इसका शानदार उदाहरण है। आजा रे परदेसी, सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, ओ सजना बरखा बहार आई और दैया रे दैया रे चढ़ गयो पापी बिछुआ जैसे गीत आज भी उनकी प्रयोगधर्मिता की पहचान हैं। सलिल चौधरी केवल फिल्मी संगीतकार ही नहीं, बल्कि साहित्य और सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़े रचनाकार थे। बिमल रॉय की फिल्म दो बीघा जमीन की कहानी उनकी कहानी रिक्शावाला से प्रेरित थी। किसान, मजदूर, गरीबी और संघर्ष की संवेदनाओं को उन्होंने अपने संगीत में प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया। धरती कहे पुकार के, बीज बिछा ले प्यार के जैसे गीतों में ग्रामीण जीवन और प्रकृति की धड़कन महसूस होती है। शैलेन्द्र, योगेश, राजेन्द्र कृष्ण और गुलजार जैसे गीतकारों के शब्दों को सलिल दा ने ऐसी धुनें दीं, जिनमें कविता और संगीत एकाकार हो गए। जागो मोहन प्यारे, ओ मन रे न गम कर, कई बार यूं ही देखा है, न जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ और जिंदगी कैसी है पहेली जैसे गीत उनकी बहुआयामी प्रतिभा के प्रमाण हैं। फिल्म आनंद में कहीं दूर जब दिन ढल जाए और जिंदगी कैसी है पहेली जैसे गीतों के माध्यम से उन्होंने जीवन, अकेलेपन और उसकी क्षणभंगुरता को बेहद संवेदनशील अंदाज में अभिव्यक्त किया। सलिल चौधरी गायकों की आवाज की प्रकृति को पहचानकर उसके अनुरूप संगीत रचने के लिए भी प्रसिद्ध थे। मुकेश, लता मंगेशकर, मन्ना डे, तलत महमूद, किशोर कुमार, आशा भोसले और येशुदास जैसे गायकों के लिए उन्होंने अलग-अलग रंगों की धुनें तैयार कीं। उनके संगीत में कोरस और बैकग्राउंड म्यूजिक का प्रयोग भी विशिष्ट पहचान बना। 1958 में मधुमती के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार मिला। बाद में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। हालांकि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उनके गीतों की वह अमर विरासत है, जो आज भी कई पीढय़िों को प्रभावित कर रही है। सलिल चौधरी ने लोकधुनों की मिट्टी, पश्चिमी संगीत की वैज्ञानिकता और भारतीय मन की संवेदनाओं को जोड़कर हिंदी फिल्म संगीत को नई दिशा दी। उनकी धुनों में कभी सावन की फुहार सुनाई देती है, कभी खेतों की खुशबू, कभी प्रेम की धड़कन और कभी जीवन का दर्शन। सलिल दा केवल धुनें नहीं बनाते थे, वे अपनी धुनों में जीवन रचते थे। उनकी पुण्यतिथि पर महान संगीतकार को सादर नमन।



