बागपत
संस्कार क्या हैं और हम अपने बच्चों को संस्कार कैसे दें?
बच्चों को संस्कारी बनाने से पहले माता-पिता को स्वयं संस्कारों का उदाहरण बनना होगा
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत। आज हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में आगे बढ़े, अच्छी नौकरी करे, सफल बने और समाज में उसका नाम हो। इसके लिए हम अच्छे स्कूल, कोचिंग, किताबें और तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। लेकिन एक सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है—क्या हमने अपने बच्चे को अच्छा इंसान बनने की शिक्षा भी दी है?
क्योंकि शिक्षा बच्चे को योग्य बना सकती है, पैसा सुविधाएं दे सकता है और पद पहचान दिला सकता है, लेकिन संस्कार ही उसे एक अच्छा इंसान बनाते हैं।
संस्कार आखिर हैं क्या?
संस्कार केवल बड़ों के पैर छूने, मंदिर जाने या धार्मिक मंत्र याद करने तक सीमित नहीं हैं। संस्कार हमारे व्यवहार में दिखाई देते हैं। किसी बुजुर्ग का सम्मान करना, जरूरतमंद की मदद करना, कमजोर के साथ अच्छा व्यवहार करना, अपनी गलती स्वीकार करना, झूठ से बचना और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना—ये सभी संस्कारों का हिस्सा हैं।
संस्कार की असली परीक्षा तब होती है जब हमें देखने वाला कोई नहीं होता।
बच्चा किसी गरीब का मजाक उड़ाता है या उसकी मदद करता है, गलती होने पर सच बोलता है या झूठ, घर में काम करने वाले व्यक्ति से सम्मान से बात करता है या अपमान से—यही उसके संस्कार बताते हैं।
बच्चों को संस्कार देने से पहले माता-पिता स्वयं संस्कारी बनें
बच्चे को संस्कारी बनाने की शुरुआत बच्चे से नहीं, माता-पिता से होती है।
हम बच्चे से कहते हैं—झूठ मत बोलो, लेकिन उसी के सामने फोन पर झूठ बोल देते हैं। हम कहते हैं—बड़ों का सम्मान करो, लेकिन अपने माता-पिता से ही ऊंची आवाज में बात करते हैं। हम कहते हैं—गाली मत देना, लेकिन गुस्से में खुद अपशब्द बोलते हैं।
फिर हम चाहते हैं कि बच्चा हमारी बात माने।
सच्चाई यह है कि बच्चे हमारे भाषणों से ज्यादा हमारा व्यवहार देखते हैं।
इसलिए माता और पिता दोनों को समझना होगा कि बच्चे उनके प्रत्येक व्यवहार से कुछ न कुछ सीख रहे हैं।
मां की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण क्यों है?
मां बच्चे की पहली पाठशाला होती है। बच्चे का शुरुआती व्यक्तित्व परिवार के वातावरण से बनता है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि बच्चे संस्कारी बनें तो मां को भी स्वयं अपने व्यवहार में संस्कारों का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
मां यदि घर के बुजुर्गों का सम्मान करती है, बच्चा सम्मान सीखेगा। वह जरूरतमंद की मदद करती है, बच्चा संवेदना सीखेगा। वह अपनी गलती स्वीकार करती है, बच्चा विनम्रता सीखेगा।
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि संस्कार की जिम्मेदारी केवल मां की है। पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बच्चे माता और पिता दोनों के व्यवहार से सीखते हैं।
बच्चे के सामने माता-पिता का व्यवहार
माता-पिता के आपसी संबंध भी बच्चे की संस्कारशाला होते हैं। पति-पत्नी के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन बच्चों के सामने एक-दूसरे को अपमानित करना, गाली देना या नीचा दिखाना उन्हें गलत संदेश दे सकता है।
बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन सम्मान खत्म नहीं होना चाहिए।
घर में जैसा वातावरण होगा, बच्चे के व्यक्तित्व पर उसका प्रभाव भी वैसा ही पड़ेगा।
बुजुर्गों का सम्मान करके दिखाएं
यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे बुढ़ापे में हमारा सम्मान करें तो हमें आज अपने माता-पिता और घर के बुजुर्गों का सम्मान करना होगा।
बच्चा वही सीखता है जो वह रोज देखता है।
यदि बच्चा देखता है कि माता-पिता दादा-दादी की सेवा करते हैं, उनकी जरूरतों का ध्यान रखते हैं और उनके साथ सम्मान से बात करते हैं तो उसके भीतर भी बुजुर्गों के प्रति सम्मान पैदा होगा।
बुजुर्गों की सेवा बच्चे के लिए संस्कार की जीवित किताब है।
हर मांग पूरी करना संस्कार नहीं
आज बच्चों को कम उम्र में ही मोबाइल, महंगे कपड़े, बाइक और अनेक सुविधाएं मिल जाती हैं। सुविधाएं देना गलत नहीं, लेकिन हर मांग तुरंत पूरी करना उचित नहीं।
बच्चे को यह समझना चाहिए कि पैसा मेहनत से आता है और हर इच्छा पूरी होना जरूरी नहीं।
उसे इंतजार करना, जरूरत और इच्छा का अंतर समझना तथा उपलब्ध चीजों की कद्र करना भी सिखाना चाहिए।
घर के छोटे काम करने दें
बच्चों को अपना कमरा व्यवस्थित करना, अपनी किताबें संभालना, अपनी प्लेट रखना और छोटे-छोटे घरेलू काम करना सिखाएं।
इससे उनमें जिम्मेदारी और श्रम के प्रति सम्मान पैदा होता है।
काम छोटा-बड़ा नहीं होता, जिम्मेदारी छोटी-बड़ी होती है।
बेटे और बेटी दोनों को घर के कामों में समान रूप से शामिल करना चाहिए।
गलती पर केवल डांटें नहीं
बच्चे गलती करेंगे। हर गलती पर मारना या अपमानित करना संस्कार नहीं देता।
बच्चे को समझाएं कि गलती क्या थी और उसे कैसे सुधारा जा सकता है। अपनी गलती स्वीकार करने और माफी मांगने की आदत डालें।
माता-पिता भी अपनी गलती होने पर बच्चे के सामने कह सकते हैं—“मुझसे गलती हुई।”
इससे बच्चा सीखेगा कि गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, जिम्मेदारी है।
मोबाइल से ज्यादा जरूरी है माता-पिता का समय
आज मोबाइल बच्चों की जिंदगी का हिस्सा है। उसे पूरी तरह दूर रखना संभव नहीं, लेकिन उसके इस्तेमाल की सीमा जरूरी है।
माता-पिता यदि खुद हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे और बच्चे से मोबाइल छोड़ने को कहेंगे तो उनकी बात का असर कम हो सकता है।
कभी मोबाइल अलग रखकर बच्चे के साथ बैठिए, उसकी बात सुनिए।
बच्चे को आपका समय चाहिए, केवल आपका इंटरनेट पैक नहीं।
धर्म के साथ मानवता भी सिखाएं
बच्चे को अपनी धार्मिक परंपराओं और संस्कृति की जानकारी देना अच्छी बात है, लेकिन साथ ही दूसरे व्यक्ति की आस्था और विचारों का सम्मान करना भी सिखाना चाहिए।
उसे बताएं कि पूजा-पाठ के साथ दया, ईमानदारी, सेवा और संयम भी जरूरी हैं।
मंदिर में सिर झुकाने से पहले किसी इंसान का दिल न दुखाना भी संस्कार है।
संस्कार सिखाए नहीं, जिए जाते हैं
हम बच्चों को कितनी भी किताबें पढ़ा लें, कितने भी भाषण दे दें या संस्कार शिविरों में भेज दें, यदि घर का वातावरण उसके विपरीत है तो सीख अधूरी रह सकती है।
बच्चे से ईमानदारी चाहते हैं तो खुद ईमानदार बनिए।
सम्मान चाहते हैं तो खुद सम्मान दीजिए।
संयम चाहते हैं तो खुद संयम रखिए।
सेवा चाहते हैं तो खुद सेवा कीजिए।
बच्चे हमारे शब्दों से कम और हमारे जीवन से ज्यादा सीखते हैं।
अंत में
हम बच्चों के लिए जमीन-जायदाद, बैंक बैलेंस और अच्छी शिक्षा छोड़ना चाहते हैं। लेकिन सबसे बड़ी विरासत संस्कार हैं।
पैसा खत्म हो सकता है, संपत्ति बिक सकती है, पद छिन सकता है, लेकिन अच्छे संस्कार जीवनभर बच्चे के साथ रहते हैं।
इसलिए बच्चों से केवल यह मत कहिए—“हमारा नाम रोशन करना।”
बल्कि अपने जीवन को ऐसा बनाइए कि बच्चा आपको देखकर कहे—
“मुझे भी अपने माता-पिता जैसा इंसान बनना है।”
क्योंकि बच्चों को दी गई संपत्ति उनकी जिंदगी बदल सकती है, लेकिन दिए गए संस्कार आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी बदल सकते हैं।
संस्कार की शुरुआत बच्चे से नहीं, माता-पिता से होती है और बच्चे की पहली पाठशाला स्कूल नहीं, उसका अपना घर होता है।


