ललितपुर
अंधाधुंध भोग के स्थान पर सादा जीवन और उच्च विचार की ओर लौटना होगा
विश्व पर्यावरण दिवस पर स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
ललितपुर। विश्व पर्यावरण दिवस 2026 पर स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने पर्यावरण संरक्षण को मानवता के अस्तित्व से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि प्रकृति हमें निरंतर संकेत देती है, जिन्हें समय रहते समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पेड़-पौधे अपनी हरियाली, छाया और नई कोपलों के माध्यम से जीवन, धैर्य और सहअस्तित्व का संदेश देते हैं। मानव समाज को भी विकास और उपभोग की अंधी दौड़ छोड़कर संतुलित एवं प्रकृति-सम्मत जीवन शैली अपनानी होगी। उन्होंने कहा कि एक समय भारत को सुजलाम, सुफलाम, शस्य-श्यामलाम कहकर उसकी प्राकृतिक समृद्धि का वर्णन किया जाता था, लेकिन आज नदियां प्रदूषण से जूझ रही हैं, भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और स्वच्छ वायु भी संकट में दिखाई दे रही है। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियों को जन्म दिया है। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है। बढ़ता समुद्र स्तर, भीषण गर्मी, अनियमित वर्षा, विनाशकारी बाढ़, जंगलों में आग और तेजी से पिघलते ग्लेशियर इसके स्पष्ट संकेत हैं। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करना मानवता के भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चुनौतियों के बावजूद आशा की किरण भी दिखाई देती है। दुनिया भर में सौर एवं पवन ऊर्जा का विस्तार हो रहा है, शहरों को अधिक हरित बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं तथा वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण अभियानों को नई गति मिली है। पर्यावरण संरक्षण अब केवल सरकारों का विषय नहीं रहा, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी बन चुका है। उन्होंने महात्मा गांधी के सादा जीवन, उच्च विचार के सिद्धांत को आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि वास्तविक समाधान केवल तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि जीवन शैली में बदलाव में भी निहित है। यदि प्रत्येक व्यक्ति जल, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का संकल्प ले, तो पर्यावरण संरक्षण का अभियान अधिक प्रभावी बन सकता है। अपने संदेश के अंत में उन्होंने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। आने वाली पीढिय़ों को स्वच्छ जल, शुद्ध वायु और सुरक्षित पर्यावरण देने के लिए अभी से ठोस कदम उठाने होंगे। प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग का संबंध स्थापित करना ही मानवता के सुरक्षित भविष्य का आधार बन सकता है। उन्होंने कहा कि धरती बहस नहीं करती, वह केवल संकेत देती है, और समय की मांग है कि हम अंधाधुंध भोग के मार्ग से लौटकर सादा जीवन एवं उच्च विचार के पथ को अपनाएं।



