ललितपुर
मुख्यमंत्री की गौरैया और जुगनू संरक्षण की चिंता को धरातल पर उतार रहे पर्यावरणविद् पुष्पेन्द्र सिंह चौहान
प्रकृति संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की अनूठी पहल, बुंदेलखंड से उठ रही पर्यावरण चेतना की नई आवाज

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
ललितपुर। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले कुछ वर्षों में अनेक अवसरों पर गौरैया, जुगनू, गिद्ध तथा अन्य लुप्तप्राय जीवों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि आधुनिक जीवनशैली, रासायनिक प्रदूषण और प्राकृतिक आवासों के विनाश के कारण गौरैया और जुगनू जैसे जीव तेजी से हमारे परिवेश से गायब होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री की यह चिंता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गौरैया किसी भी क्षेत्र के शहरी और ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत का संकेतक पक्षी मानी जाती है, जबकि जुगनू जैव विविधता और स्वच्छ पर्यावरण के प्रतीक हैं। जुगनुओं की घटती संख्या बढ़ते प्रकाश प्रदूषण, रासायनिक कीटनाशकों और प्राकृतिक आवासों के विनाश की ओर संकेत करती है। इसी सोच को जमीनी स्तर पर साकार करने का कार्य बुंदेलखंड के पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता पुष्पेन्द्र सिंह चौहान द्वारा किया जा रहा है। लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने में जुटे चौहान ने अपने प्रयासों से यह साबित किया है कि यदि समाज जागरूक हो जाए तो प्रकृति संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जनभागीदारी का व्यापक अभियान बन सकता है।
गौरैया संरक्षण बना जनअभियान
पुष्पेन्द्र सिंह चौहान द्वारा संचालित गौरैया बचाओ अभियान ने जनपद ललितपुर सहित बुंदेलखंड क्षेत्र में व्यापक जनजागरण पैदा किया है। लोगों को अपने घरों, विद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर गौरैया के लिए घोंसले लगाने तथा पानी और दाने की व्यवस्था करने के लिए प्रेरित किया गया। परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर गौरैया की वापसी दर्ज की गई, जिससे स्थानीय लोगों में पर्यावरण के प्रति नई चेतना विकसित हुई।
जुगनुओं के संरक्षण की आवश्यकता पर विशेष बल
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी क्षेत्र से जुगनू गायब हो रहे हैं तो यह प्राकृतिक संतुलन के लिए गंभीर चेतावनी है। चौहान लगातार अपने लेखों, व्याख्यानों और सामाजिक अभियानों के माध्यम से लोगों को जुगनुओं के महत्व से परिचित करा रहे हैं। उनका मानना है कि खेतों और ग्रामीण क्षेत्रों में रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग कम किए बिना जुगनुओं की वापसी संभव नहीं है।
गिद्ध, तितली और जैव विविधता संरक्षण में भी उल्लेखनीय योगदान
गौरैया और जुगनुओं के अतिरिक्त चौहान ने गिद्ध संरक्षण, तितली संरक्षण तथा स्थानीय जैव विविधता के दस्तावेजीकरण पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। बुंदेलखंड क्षेत्र में गिद्धों की घटती संख्या पर उन्होंने लगातार चिंता व्यक्त की है और लोगों को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया है। तितलियों के संरक्षण को लेकर भी उनके अभियान उल्लेखनीय रहे हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि तितलियां किसी भी क्षेत्र की जैव विविधता और पौधों की समृद्धि का महत्वपूर्ण संकेतक होती हैं। इनके संरक्षण से परागण की प्राकृतिक प्रक्रिया को भी बढ़ावा मिलता है।
राष्ट्रीय वृक्ष बरगद के संरक्षण का अभियान
हाल ही में पुष्पेन्द्र सिंह चौहान द्वारा राष्ट्रीय वृक्ष वट (बरगद) के संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण को लेकर चलाया जा रहा अभियान भी चर्चा का विषय बना हुआ है। बुंदेलखंड के ऐतिहासिक और विरासत स्वरूप बरगद वृक्षों का अभिलेखीकरण कर उन्हें संरक्षण की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे स्थानीय प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं।
वन विभाग और सामाजिक संगठनों के बीच समन्वय की आवश्यकता
विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार और वन विभाग द्वारा संचालित पर्यावरणीय योजनाओं को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए ऐसे सामाजिक प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यदि सरकारी तंत्र और सामाजिक संगठन मिलकर कार्य करें तो गौरैया, जुगनू, गिद्ध तथा अन्य जैव विविधता के संरक्षण में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की जा सकती है।
पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी का स्वरूप देने की जरूरत
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा व्यक्त की गई पर्यावरणीय चिंताओं को धरातल पर उतारने के लिए समाज में अनेक लोग कार्य कर रहे हैं। उनमें पुष्पेन्द्र सिंह चौहान का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण को केवल एक विषय नहीं बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। आज जब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का संकट और पर्यावरणीय असंतुलन पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब ऐसे प्रयास समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं। गौरैया की चहचहाहट, जुगनुओं की चमक, गिद्धों की सुरक्षित उड़ान और विशाल वट वृक्षों की छाया आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित रहे, यही विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक संदेश है।



