ललितपुर

कबीर जयंती विशेष

कबीर की वाणी आज भी अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध समाज को करती है जागृत : सिद्धार्थ शर्मा

समता, न्याय और मानवता के मूल्यों को जीवन में अपनाने का दिया संदेश
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
ललितपुर। कबीर जयंती पर स्तंभकार सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि भारत की संत परंपरा में संत कबीर का व्यक्तित्व एक ऐसे लोकनायक के रूप में स्थापित है, जिन्होंने धर्म, जाति, पंथ और ऊँच-नीच की कृत्रिम दीवारों को चुनौती देते हुए मानवता को सर्वोपरि माना। उन्होंने कहा कि कबीर केवल संत या कवि नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के ऐसे प्रखर प्रवक्ता थे, जिनकी वाणी आज भी अन्याय, भेदभाव और शोषण के विरुद्ध जनमानस को जागृत करती है। उन्होंने कहा कि कबीर जयंती केवल एक संत का जन्मोत्सव नहीं, बल्कि समता, न्याय, प्रेम और मानवीय गरिमा जैसे मूल्यों को स्मरण करने का अवसर है, जिनकी आवश्यकता आज भी उतनी ही है जितनी लगभग छह सौ वर्ष पहले थी। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि कबीर की वाणी का प्रत्येक शब्द समाज के अंतिम व्यक्ति के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। उनका प्रसिद्ध दोहा दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय। मुई खाल की साँस सों, सार भसम हो जाय॥ आज भी सत्ता, अहंकार और शोषण के विरुद्ध एक गंभीर चेतावनी के रूप में प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि कबीर जानते थे कि पीड़ित की आह इतिहास का रुख बदलने की शक्ति रखती है। उन्होंने कहा कि मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के दौरान कबीर ने धर्म के नाम पर फैले आडंबर, कर्मकांड और रूढय़िों का विरोध करते हुए बताया कि ईश्वर मंदिर, मस्जिद या तीर्थों में नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान है। उनके अनुसार सच्ची भक्ति वही है, जिसमें मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम, समानता और सद्भाव स्थापित हो। उन्होंने कहा कि कबीर की दृष्टि में सभी स्त्री-पुरुष एक ही परमात्मा की संतान हैं। जब सभी में एक समान ईश्वर का वास है, तब जाति, छुआछूत और ऊँच-नीच का कोई स्थान नहीं रह जाता। उनका यह चिंतन आज के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के भी अत्यंत निकट है। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि संत कबीर का वैराग्य जीवन से पलायन का नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने का मार्ग है। उनका प्रसिद्ध दोहा साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥ संतोष, सामाजिक उत्तरदायित्व और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि कबीर न तो असीम संग्रह के पक्षधर थे और न ही अभाव के, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें किसी के पास आवश्यकता से अधिक न हो और कोई भूखा न रहे। उन्होंने अंत में कहा कि जब तक समाज में अन्याय, भेदभाव और शोषण रहेगा, तब तक कबीर की वाणी प्रासंगिक बनी रहेगी। कबीर को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनकी शिक्षाओं को केवल उद्धृत करने तक सीमित न रखकर समता, न्याय, करुणा और मानवीय संवेदनाओं को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।
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