
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
भुसावर : पूर्वी राजस्थान की पहचान रही कन्हैया पद दंगल की परम्परा आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच धीरे- धीरे विलुप्त होने के कगार पर है। जहां एक समय था जब गांव गांव में पद दंगल की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती थी, लेकिन आज डीजे और मोबाइल मनोरंजन के इस दौर में यह लोक संस्कृति सिमटती जा रही है। फिर भी ग्रामीण समाज और संस्कृति प्रेमियों की कोशिशों से इस की लौ अभी भी जल रही है। कन्हैया पद दंगल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की आत्मा माना जाता है। जहां इस पद दंगल में दो या अधिक गांवों की मंडलिया आमने- सामने बैठकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं,यशोदा, रुक्मणी जी, मीरा, नरसी भगत और राजा हरिशचन्द जैसी पौराणिक कथाओं व धार्मिक प्रसंगो पर आधारित गीतों का गायन करती है। जहां श्रोता भाव विभोर होकर भक्ति और संगीत का आनन्द लेते हैं। वहीं बुजुर्ग बताते हैं कि पद दंगल की यह परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों में भाईचारा, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम रही है।
“”न्यौता पर ही होता है आयोजन””
ग्रामीण क्षेत्र के निवासी जगदीश मीणा, भीम सिंह, शिवराम और बबलू ने जानकारी देते हुए बताया कि पद दंगल के लिए एक न्योता ही काफी होता है। जिसमे कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। जिस गांव में पद दंगल का आयोजन होता है, वहां की कमेटी निमंत्रण देकर बुलाती है, और कलाकार मान सम्मान में ही खुश हो जाते हैं।
“””ग्रामीणों की पहल””
ग्रामीण क्षेत्र के श्रद्धालुओं ने जानकारी देते हुए बताया कि ग्रामीण और संस्कृति प्रेमी पद दंगल की परम्परा को जीवित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। जहां सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा मेले व धार्मिक आयोजनो में पद दंगल का आयोजन करवाया जा रहा है। जिससे इसमें केवल पुरानी परंपरा को नई जिंदगी मिल रही है, बल्कि युवाओं में भी संस्कृति के प्रति रुची बढ़ रही है।
“”पद दंगल में मिलती है भाईचारे की मिशाल””
वहीं भुसावर क्षेत्र के लोगों ने बताया कि पद दंगल का आयोजन सामाजिक उद्देश्य भी रहा है। जहां गीतो के माध्यम से नशा मुक्ति, सामाजिक कुरुतियों के विरुद्ध और सदाचार का संदेश दिया जाता है। पहले युवा बड़ी संख्या में पद दंगल में भाग लेते थे,लेकिन अब आधुनिक साधनों की लोकप्रियता और युवाओं को अपनी जड़ों से दूर होना इस कला के लिए चुनौती बन गया है।


