बागपत

काश! देश न भी होता, मगर, भारत माँ होती।

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
काश
काश! देश न भी होता,
मगर, भारत माँ होती।
संविधान न भी होता,
मगर, अटल सिद्धान्त होते।।
काश! चिड़ियाओं का खुला- नीला अंबर होता,
मछलियों के तैरने का समंदर होता।
कुछ लोग कहते हैं,
अंबर-समंदर तो आज भी होते हैं।
मगर, पूछो उन चिड़ियाओं से,
जिनका अंबर बिजलियों की तारो से घिर जाता है।
पूछो उन मछलियों से,
जिनका दम जल-प्रदूषण से घुट जाता है।।
काश! मानव ना भी होते,
मगर मानवता होती।
चलो म लिख भी दू कि मानव होते,
पशु, जीव और प्राणी भी होते,
बस प्राणी—वन्यप्राणी जैसे न होते।।
                  नूपुर चौधरी बागपत।
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