बागपत

वैज्ञानिक इस्तीफा दे रहे हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं—क्या यह देश के भविष्य के लिए चेतावनी है?

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत। भारत आज विज्ञान, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने की बात कर रहा है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक देश ने दुनिया में अपनी पहचान बनाई है। लेकिन इसी दौर में दो घटनाएं गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं—अनुभवी वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण संस्थानों से इस्तीफा देना और बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों का बंद या विलय होना।
इन दोनों घटनाओं को केवल अलग-अलग प्रशासनिक फैसले मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। वैज्ञानिक देश के तकनीकी भविष्य की नींव तैयार करते हैं और स्कूल उस भविष्य के लिए मानव संसाधन तैयार करते हैं। इसलिए सवाल यह है कि क्या हम वर्तमान को संभालने के चक्कर में भविष्य की नींव कमजोर तो नहीं कर रहे?
इसरो के वैज्ञानिक आखिर इस्तीफा क्यों दे रहे हैं?
जुलाई 2026 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो से अनुभवी वैज्ञानिकों के जाने का मामला सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार पिछले एक वर्ष में अनुमानित 100 से 120 वैज्ञानिक इसरो छोड़कर स्पेस स्टार्टअप्स से जुड़े हैं। इसके बाद अंतरिक्ष विभाग ने गगनयान और अन्य महत्वपूर्ण मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को स्वीकार करने की प्रक्रिया कड़ी कर दी।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—हर इस्तीफा असंतोष का प्रमाण नहीं होता। निजी क्षेत्र में बेहतर वेतन, नई तकनीक पर काम करने का अवसर, तेज करियर विकास और स्टार्टअप संस्कृति जैसे कारण भी किसी वैज्ञानिक को सरकारी संस्था छोड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है जब किसी संस्था से केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि दशकों का अनुभव और विशेष तकनीकी ज्ञान बाहर जाने लगे।
रिपोर्टों में इसरो के पूर्व अधिकारियों ने भी वेतन और प्रोत्साहन जैसे मुद्दों का उल्लेख किया है। पूर्व इसरो अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने विशेष रूप से प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को बनाए रखने के लिए बेहतर प्रोत्साहन की जरूरत बताई।
वैज्ञानिक की जगह केवल दूसरा कर्मचारी नहीं आ सकता
एक वैज्ञानिक के पद पर नया व्यक्ति नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन उसके स्थान पर उसी दिन उतना ही अनुभव नहीं लाया जा सकता।
मान लीजिए किसी वैज्ञानिक ने 15-20 साल किसी विशेष रॉकेट, सैटेलाइट, इंजन या अंतरिक्ष मिशन पर काम किया है। उसके पास केवल किताबों का ज्ञान नहीं होता, बल्कि हजारों परीक्षणों, असफलताओं और समस्याओं से निकला व्यावहारिक अनुभव भी होता है।
यही संस्थागत ज्ञान किसी देश की असली वैज्ञानिक पूंजी होता है।
इसलिए वैज्ञानिकों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि देश कितने अनुभवी वैज्ञानिकों को अपने साथ बनाए रख पा रहा है।
गगनयान जैसे मानव अंतरिक्ष मिशन, भविष्य के चंद्र मिशन और प्रस्तावित भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसी परियोजनाओं में ऐसी विशेषज्ञता का महत्व और बढ़ जाता है।
लेकिन निजी क्षेत्र का बढ़ना भी जरूरी है
यह तस्वीर का दूसरा पहलू है।
अगर वैज्ञानिक इसरो से निकलकर भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में जा रहे हैं तो इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि देश में निजी अंतरिक्ष उद्योग विकसित हो रहा है। निजी कंपनियों में वैज्ञानिकों के लिए नए अवसर पैदा होना अपने आप में नकारात्मक घटना नहीं है।
असल चुनौती यह है कि सरकारी संस्थान और निजी क्षेत्र एक-दूसरे को कमजोर करने के बजाय एक-दूसरे को मजबूत करें।
निजी कंपनियां प्रतिभाओं को अवसर दें, लेकिन राष्ट्रीय महत्व की संस्थाएं भी ऐसी परिस्थितियां बनाएं कि वैज्ञानिक केवल वेतन या बेहतर अवसर के कारण संस्थान छोड़ने को मजबूर महसूस न करें।
दूसरी बड़ी चिंता—स्कूल क्यों बंद हो रहे हैं?
वैज्ञानिक देश का भविष्य बनाते हैं, लेकिन वैज्ञानिक पैदा कहां होते हैं?
स्कूल में।
यही कारण है कि स्कूलों की संख्या में कमी का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में देश में लगभग 14.71 लाख स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर लगभग 14.67 लाख रह गए। इस दौरान कुल 4,791 स्कूल कम हुए। सरकारी स्कूलों की संख्या लगभग 10.13 लाख से घटकर 10.05 लाख हुई।
अर्थात सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी जरूर हुई है।
लेकिन यहां भी पूरी तस्वीर समझना जरूरी है। स्कूलों के बंद या विलय के पीछे कई कारण बताए जाते हैं—कम छात्र संख्या, ग्रामीण आबादी का बदलना, शहरों की ओर पलायन, कम जन्मदर और संसाधनों को एक बड़े स्कूल में केंद्रित करने की सरकारी नीति।
कुछ राज्यों में छोटे और कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बड़े स्कूलों में मिलाकर बेहतर शिक्षक, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का तर्क दिया जाता है।
इसलिए हर स्कूल का बंद होना शिक्षा व्यवस्था के पतन का प्रमाण नहीं है।
लेकिन असली सवाल यह है—
जिस स्कूल को बंद किया जा रहा है, वहां पढ़ने वाले बच्चे अब कितनी दूर जाएंगे?
अगर गांव का स्कूल बंद करके बच्चों को 5-10 किलोमीटर दूर भेजना पड़े, तो गरीब परिवारों, छोटी उम्र के बच्चों और विशेष रूप से लड़कियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
यहीं से स्कूल बंद करने की नीति की असली परीक्षा शुरू होती है।
स्कूल केवल चार दीवारें नहीं होते
गांव का सरकारी स्कूल सिर्फ पढ़ाई का केंद्र नहीं होता।
वह गांव के बच्चे को उसके घर के पास शिक्षा देता है।
वहीं उसे शिक्षक मिलता है, दोस्त मिलते हैं, खेल का मैदान मिलता है, सामाजिक व्यवहार सीखने का अवसर मिलता है और आगे बढ़ने का सपना मिलता है।
अगर स्कूल दूर हो जाए तो संपन्न परिवार अपने बच्चे को निजी वाहन से भेज सकता है। लेकिन गरीब किसान, मजदूर या सीमित आय वाला परिवार क्या करेगा?
यही कारण है कि स्कूलों का विलय या बंदी केवल प्रशासनिक गणित नहीं होना चाहिए।
हर फैसले में यह भी देखना जरूरी है कि बच्चे की पहुंच, सुरक्षा और पढ़ाई पर उसका वास्तविक प्रभाव क्या होगा।
लोकसभा में सरकार ने भी स्पष्ट किया था कि स्कूलों को खोलना, मिलाना या बंद करना राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
एक तरफ वैज्ञानिकों की कमी, दूसरी तरफ बच्चों के स्कूलों की कमी
यहां दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।
आज का बच्चा ही कल का वैज्ञानिक बनेगा।
लेकिन इसके लिए उसे अच्छी प्राथमिक शिक्षा, मजबूत माध्यमिक शिक्षा, प्रयोगशाला, गणित-विज्ञान की समझ, शिक्षक और अवसर चाहिए।
यदि गांवों में गुणवत्तापूर्ण स्कूल कमजोर होंगे, बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी या आर्थिक कारणों से वे शिक्षा से दूर होंगे, तो आने वाले वर्षों में उच्च शिक्षा में प्रतिभाओं की संख्या पर असर पड़ सकता है।
हालांकि वर्तमान आंकड़े यह साबित नहीं करते कि स्कूलों के बंद होने से सीधे वैज्ञानिकों की संख्या कम हो रही है। यह एक दीर्घकालीन संभावित प्रभाव है, जिसे गंभीरता से अध्ययन करने की जरूरत है।
सरकार को क्या करना चाहिए?
जरूरत इस बात की है कि सरकार वैज्ञानिकों और शिक्षकों दोनों को राष्ट्र निर्माण की केंद्रीय ताकत माने।
वैज्ञानिकों के लिए
महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संस्थानों में अनुभवी वैज्ञानिकों को बनाए रखने के लिए विशेष प्रोत्साहन हो।
निजी क्षेत्र और सरकारी संस्थानों के बीच प्रतिभा के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो।
वैज्ञानिकों को शोध की स्वतंत्रता और आधुनिक सुविधाएं मिलें।
महत्वपूर्ण मिशनों से जुड़े विशेषज्ञों के अनुभव को सुरक्षित रखने की व्यवस्था हो।
केवल रिक्त पद भरने के बजाय विशेषज्ञता और संस्थागत ज्ञान को प्राथमिकता दी जाए।
स्कूलों के लिए
स्कूल बंद करने से पहले स्थानीय स्तर पर सामाजिक और शैक्षिक प्रभाव का अध्ययन हो।
छोटे बच्चों के लिए स्कूल की दूरी एक प्रमुख मानदंड हो।
यदि विलय जरूरी हो तो परिवहन की व्यवस्था अनिवार्य हो।
ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर विशेष प्रभाव का आकलन हो।
बंद स्कूलों की जगह केवल कागजों में नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से बेहतर सुविधाओं वाले स्कूल तैयार किए जाएं।
विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय, कंप्यूटर और इंटरनेट को सरकारी स्कूलों में मजबूत किया जाए।
UDISE+ के अनुसार 2025-26 में देश में 1,00,843 स्कूल ऐसे थे जहां केवल एक शिक्षक था और इनमें करीब 29.12 लाख विद्यार्थी पढ़ रहे थे। यह आंकड़ा भी बताता है कि समस्या केवल स्कूलों की संख्या की नहीं, बल्कि स्कूलों में उपलब्ध शैक्षणिक संसाधनों की भी है।
देश को आंकड़ों से आगे जाकर भविष्य देखना होगा
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी और प्रतिभा है।
आज कोई बच्चा गांव के सरकारी स्कूल में बैठकर विज्ञान की किताब पढ़ रहा है। हो सकता है वही बच्चा 20 साल बाद कोई नया उपग्रह बनाए, कोई नई दवा खोजे या देश की किसी बड़ी तकनीकी परियोजना का नेतृत्व करे।
इसलिए स्कूल में बचाई गई एक बस की लागत और भविष्य में खोई हुई एक प्रतिभा की कीमत की तुलना नहीं की जा सकती।
इसी तरह किसी वैज्ञानिक का इस्तीफा केवल एक कर्मचारी की विदाई नहीं है, यदि उसके साथ महत्वपूर्ण तकनीकी अनुभव भी संस्था से बाहर जा रहा हो।
भारत को ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है जिसमें स्कूल मजबूत हों, शिक्षक सम्मानित हों, वैज्ञानिक सुरक्षित और प्रोत्साहित हों तथा निजी क्षेत्र भी तेजी से आगे बढ़े।
क्योंकि मजबूत देश केवल बड़े भवनों, एक्सप्रेसवे और तकनीक से नहीं बनता।
मजबूत देश वह है जो अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देता है, अपने शिक्षक को सम्मान देता है और अपने वैज्ञानिक को देश में काम करने के लिए बेहतर वातावरण देता है।
आज अगर हम वैज्ञानिकों के इस्तीफे को केवल नौकरी बदलना और स्कूलों के बंद होने को केवल प्रशासनिक पुनर्गठन मानकर आगे बढ़ गए, तो हो सकता है कि इसका वास्तविक असर हमें कई वर्षों बाद दिखाई दे।
और तब सवाल यह होगा—
हमने देश का वर्तमान तो संभाल लिया, लेकिन क्या भविष्य की नींव उतनी मजबूत रख पाए?
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