ललितपुर
शिक्षक ही समाज का इंजन है : सिद्धार्थ शर्मा
ज्ञान के साथ संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण की जिम्मेदारी भी निभाता है शिक्षक

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
ललितपुर। शिक्षक दिवस के अवसर पर स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षण कुछ न कुछ सीखता और सिखाता है। इस अर्थ में हर व्यक्ति शिक्षक की भूमिका में है, लेकिन आचार्यों, संतों और महात्माओं ने ज्ञान एवं जीवन-दृष्टि का जो प्रसार किया, उसकी शक्ति सम्राटों, सेनापतियों और धनकुबेरों की शक्ति से अलग रही है। यही कारण है कि भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा आज भी प्रासंगिक और कालातीत बनी हुई है। आधुनिक शिक्षक दिवस को प्राचीन भारतीय गुरु पूर्णिमा की परंपरा का आधुनिक स्वरूप भी माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य मूलत: कर्मशील और सृजनशील प्राणी है। प्रकृति से प्राप्त धरती, धूप, हवा, पानी, अग्नि और आकाश जैसी शक्तियों का उपयोग कर वह अपने आदर्शों के अनुरूप संसार को बेहतर बनाने का निरंतर प्रयास करता है। ज्ञान और विवेक के बल पर मनुष्य अपने परिवेश को बदलने तथा स्वयं को निरंतर विकसित करने की क्षमता रखता है। इसी विकास यात्रा में शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण पथप्रदर्शक की भूमिका निभाता है। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि मनुष्य की शिक्षा यात्रा की पहली गुरु उसकी मां होती है। शिशु जब पहली बार संसार में आता है तो अपनी आवश्यकताओं को रोकर व्यक्त करता है। मां अपने वात्सल्य से उसे सीने से लगाती है, उसकी भूख शांत करती है और अनजाने में ही प्रेम, ममता और त्याग का पाठ पढ़ाती है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया है। उन्होंने कहा कि शिशु शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा का आधार भी वात्सल्य और आत्मीयता है। शिक्षक केवल पुस्तकों का ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह विद्यार्थी के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानता है, उसकी जिज्ञासा को दिशा देता है और उसके व्यक्तित्व का निर्माण करता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना या विद्यार्थियों को परीक्षा में अच्छे अंक दिलाना नहीं है। उसका वास्तविक दायित्व ऐसी पीढ़ी तैयार करना है, जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ जिम्मेदार, संवेदनशील और संस्कारवान नागरिक बने। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासक, न्यायाधीश, साहित्यकार, कलाकार और राजनेता जैसे विभिन्न क्षेत्रों में किसी न किसी शिक्षक के मार्गदर्शन की छाप दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का आकलन केवल उसकी आर्थिक समृद्धि से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना आवश्यक है कि उस समाज में शिक्षकों को कितना सम्मान प्राप्त है और वे नई पीढ़ी के निर्माण में कितनी प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। सिद्धार्थ शर्मा ने भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि चाणक्य ने चंद्रगुप्त जैसे शिष्य को तैयार कर इतिहास की दिशा बदल दी। गुरु द्रोणाचार्य, स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस और आधुनिक भारत के महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन इसी गौरवशाली परंपरा के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. राधाकृष्णन केवल देश के राष्ट्रपति ही नहीं, बल्कि महान दार्शनिक, शिक्षाविद और शिक्षक भी थे। उनके जन्मदिन 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता ऐसे शिक्षकों की है, जो विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अच्छा इंसान, जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील समाज का निर्माता बनने के लिए प्रेरित करें। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर विवेक, संवेदना और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी है। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि शिक्षक वास्तव में समाज का इंजन है। इंजन जितना सक्षम होगा, समाज की यात्रा उतनी ही तेज, संतुलित और सही दिशा में होगी। शिक्षक केवल वर्तमान पीढ़ी को शिक्षित नहीं करता, बल्कि आने वाली पीढय़िों के भविष्य की नींव भी रखता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का सम्मान केवल शिक्षक दिवस तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जिस समाज ने अपने शिक्षकों को सम्मान दिया है, उसने वास्तव में अपने भविष्य को सम्मान दिया है। शिक्षक के हाथों में केवल चॉक और किताब नहीं होती, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य की जिम्मेदारी होती है।



