बागपत

सत्यपाल मलिक – बागपत का सच्चा और ईमानदार बेटा,

जिसका आज तक कोई मुकाबला नहीं

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।

बागपत। जब देश की राजनीति अवसरवाद, चाटुकारिता और पदलोलुपता से ग्रसित होती जा रही थी, तब भी एक ऐसा नेता था जो सत्य, साहस और स्वाभिमान के साथ अपने विचारों पर अडिग रहा। वह कोई और नहीं, बागपत की मिट्टी में जन्मा सत्यपाल मलिक है – बागपत का सच्चा और ईमानदार बेटा, जिसका आज तक कोई मुकाबला नहीं।

जमीनी पृष्ठभूमि से राष्ट्रीय मंच तक का सफर

सत्यपाल मलिक का जन्म 24 जुलाई 1946 को बागपत के छोटे से गांव हिसावड़ा में हुआ। एक साधारण किसान परिवार से निकलकर उन्होंने राजनीति में असाधारण पहचान बनाई। छात्र राजनीति से लेकर संसद तक का उनका सफर सिर्फ एक राजनेता का नहीं, बल्कि बागपत की ज़मीन से निकले एक सच्चे सिपाही का प्रमाण है, जो हर मोड़ पर अपने जमीर के साथ खड़ा रहा।


राजनीति में विचारों का योद्धा

वे कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे, और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी। परंतु वे किसी भी पद के गुलाम नहीं बने।
उनकी स्पष्टवादिता ही उनकी पहचान बन गई। वे हर समय जनता के सवालों पर, और खासकर किसानों के अधिकारों के लिए बोलते रहे – चाहे विपक्ष में हों या सत्ता के समीप।


राज्यपाल रहते हुए भी सच्चाई से समझौता नहीं

राज्यपाल के रूप में उन्होंने बिहार, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय जैसे राज्यों में कार्य किया, पर किसी भी सरकार की कठपुतली नहीं बने।

  • जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने जैसे ऐतिहासिक फैसले के समय वे वहां के राज्यपाल थे।
  • गोवा और मेघालय में उन्होंने खुलेआम कहा – “सरकारों में भ्रष्टाचार है और मुझे चुप नहीं रहना आता।”
    ऐसे राजनेता आज दुर्लभ हैं, जो पद पर रहते हुए भी सत्ता के खिलाफ सच बोलें।

किसानों का मसीहा – बागपत की आत्मा की आवाज़

2020-21 के किसान आंदोलन में जब देश की राजधानी की सीमाओं पर लाखों किसान बैठे थे, तब बागपत के इस सपूत ने कहा:

“मैं किसान का बेटा हूँ, मैं अपने भाइयों को पीड़ित होते हुए चुप नहीं देख सकता।”

उन्होंने कहा कि सरकार ने किसानों के साथ अन्याय किया है, और प्रधानमंत्री तक को जिम्मेदारी लेने की नसीहत दी।
देश भर के किसानों ने उन्हें साहसी, सच्चे और अपने जैसे नेता के रूप में देखा।


पुलवामा हमले और उनका विवेकपूर्ण बयान

उन्होंने पुलवामा हमले में भी बड़ी प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया और कहा कि अगर उनकी सलाह मानी जाती, तो वह त्रासदी टल सकती थी।
सत्ता में रहकर भी उन्होंने देशहित में सच्चाई बोलने का साहस दिखाया – यह कोई आम नेता नहीं, बल्कि बागपत की आत्मा से निकली सच्ची आवाज़ ही कर सकती है।


अंतिम क्षण तक राष्ट्रसेवा का प्रण

राज्यपाल कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी उन्होंने सक्रियता छोड़ी नहीं। वे देश के अहम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय देते हैं।
उनका यह संकल्प कि –

“मैं अंतिम सांस तक देश की सेवा करता रहूंगा, पद हो या न हो”
उन्हें एक लोकतांत्रिक संत की श्रेणी में खड़ा करता है।


बागपत का गौरव – जिसकी नज़र में सच्चाई सबसे बड़ा धर्म है

सत्यपाल मलिक सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बागपत की सच्चाई, संघर्ष, स्वाभिमान और स्पष्टता का नाम है।
वे आज भी युवाओं के लिए आदर्श हैं, किसानों के लिए शक्ति हैं, और सत्ताधारियों के लिए आईना।
बागपत की धरती ने कई लाल पैदा किए, पर ऐसा सच्चा और ईमानदार बेटा, जिसका आज तक कोई मुकाबला नहीं – सिर्फ सत्यपाल मलिक हैं।


 

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