स्वतंत्रता, प्यार और जीवन के अनिश्चित रिश्तों की खूबसूरत कहानी
धरोहर ने किया "पंछी ऐसे आते हैं" का मंचन

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बोकारो। चंद्रपुरा के सांस्कृतिक संस्था धरोहर ने स्थानीय युवा रंगमंच सभागार, चंद्रपुरा में विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित एवं संजय कुमार द्वारा निर्देशित हिंदी नाटक ‘पंछी ऐसे आते हैं’ का मंचन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि श्रीमती चांदनी परवीन, प्रमुख चंद्रपुरा प्रखंड, श्रीमती नीतू सिंह जिला परिषद सदस्य एवं श्रीमती अनीता गुप्ता, पूर्व प्रमुख, चंद्रपुरा प्रखंड, बोकारो ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
“पंछी ऐसे आते हैं” मूल रूप से विजय तेंडुलकर का एक प्रसिद्ध नाटक है, जो मूल मराठी कृति ‘अशी पाखर येती’ का हिंदी अनुवाद है। इस नाटक में एक स्वतंत्र विचारों वाला युवक, अरुण, एक मध्यमवर्गीय परिवार में आता है और कहानी में मोड़ लाता है। कहानी की प्रस्तुति एक नाटक, एक टीवी फ़िल्म और एक पुस्तक के रूप में की गई है।
नाटक: यह एक लोकप्रिय नाटक है जो भारत के कई शहरों में खेला गया है।
यह एक ऐसे युवक की कहानी है जो एक परिवार में एक पंछी की तरह आता है। परिवार की बेटी, सरसती, जो अपने पारंपरिक विचारों से अलग सोच रखती है, अरुण से प्रभावित होती है, जबकि अन्य रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पाते।
मुख्य अतिथि ने अपने उद्बोधन में कहा कि सोशल मीडिया, वेब सीरीज और टीवी सीरियल्स के दौर में नाट्य विधा को जीवित रखना बहुत ही प्रशंसनीय है। यह विधा आज भी लोगों को आकर्षित और प्रभावित करती है। नाटकों का मंचन निरंतर होते रहना चाहिए। नाटक में अरुण की भूमिका में मनोज कुमार, बंन्डा की भूमिका में संतोष कुमार, अन्ना की भूमिका में प्रदीप कुमार, विश्वास की भूमिका में मोहम्मद वाहिद, सरु की भूमिका में लक्ष्मी कुमारी दास, मां की भूमिका में रिंकी कुमारी दास,
नेपत्थ्य में आयोजन प्रभारी लक्ष्मी कुमारी एवं लक्ष्मी देवी, मंच प्रबंधन श्याम कृष्ण खत्री, प्रकाश विक्रांत पासवान, रूप एवं वस्त्र सज्जा संतोष एवं मृत्युंजय भौमिक, मंच सज्जा मृत्युंजय भौमिक, बैकग्राउंड म्यूजिक मोहम्मद वाहिद, प्रचार प्रसार नीतू कुमारी, मीडिया प्रभारी नीतू कुमारी सहायक निर्देशन प्रदीप एवं संतोष, मंच संचालन वर्षा अग्रहरि, आयोजन सहायक में रूपेंद्र नारायण सिंह, रामकुमार महाराज, अरुण, मनोज, सुबह पसंद जयशंकर महेंद्र सिंह आदि मौजूद थे।

अभिनय : कथा का मुख्य पात्र अरुण अभिनीत किया है मनोज कुमार दास ने। पूरे नाटक का दारोमदार उन पर ही है। उनकी अच्छी बात यह है कि उन्होंने कोशिश पूरी ईमानदारी से की है। हालांकि अंत तक आते- आते वे रम जाते हैं और नाटक पर पकड़ बना लेते हैं। नाटक देखते हुए लगा कि संवाद उन्हें बखूबी याद हैं बस उन्हें भावों के साथ अभिव्यक्त करने की कुशलता विकसित करने की जरूरत है। बावजूद इसके शरद अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे।
सरस्वती की भूमिका में लक्ष्मी कुमारी दास की कोशिशें रंग लाई है। कुछ भाव उनके चेहरे पर स्थायी लगे लेकिन वह अपना स्थान पूरे नाटक में मजबूती से बनाती है। आत्मविश्वास और अभिनय का सुंदर संयोजन उनमें दिखाई दिया। अन्ना यानी सरस्वती के पिता की भूमिका में प्रदीप कुमार का पूरा असर मंच पर दिखाई देता है। प्रदीप का अभिनय लाजवाब है। उनकी बॉडी लैंग्वेज उन्हें मंच पर आसानी से स्थापित करने में मददगार साबित हुई। माता की भूमिका में रिंकी कुमारी सबसे सहज लगी। बंडा यानी भाई की भूमिका में संतोष कुमार पर हास्य गुंथने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने इसे ईमानदारी से निभाया भी। सरस्वती को देखने आए विश्वास की भूमिका में मोहम्मद वाहिद चॉकलेटी चेहरे में भी अभिनय के प्रति गंभीर लगे।

निर्देशन : निर्देशन की कसावट और चमक मुक्त कंठ से प्रशंसनीय है। आरंभिक विस्तार में थोड़ा संपादन और संभव है फिर भी संजय कुमार अपने अनुभव से इस नाटक को पूर्णत: अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम रहे
लेकिन उनका मंजा हुआ अनुभव नाटक को वांछित ऊंचाई दे गया। संवाद अच्छी भाषा में सलीके से लिखे गए हैं।



