
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बागपत। आज का सबसे भयावह और चिंताजनक सच यह है कि नशे की बढ़ती लत युवा और युवतियों को असमय मौत की ओर धकेल रही है। हँसते-खेलते चेहरे, सपनों से भरी आँखें और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें—सब कुछ नशे के जहर में धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। यह केवल किसी एक परिवार या वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के अस्तित्व पर लगा प्रश्नचिह्न है।
कभी सिगरेट और शराब से शुरू होने वाला नशा आज गांजा, चरस, स्मैक, अफीम, नशीली गोलियाँ, इंजेक्शन और सिंथेटिक ड्रग्स तक पहुँच चुका है। नशे के ये भिन्न-भिन्न रूप युवाओं को भीतर से खोखला कर रहे हैं। सड़क हादसे, आत्महत्याएँ, अपराध और असमय मौतें—आज नशे की कड़वी सच्चाई बन चुकी हैं।
नशा और मानसिक स्वास्थ्य का खतरनाक रिश्ता
नशा केवल आदत नहीं, बल्कि मानसिक पीड़ा का संकेत है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, असफलता का डर, पारिवारिक संवाद की कमी और अकेलापन—युवाओं को मानसिक अवसाद की ओर ले जाता है। नशा उन्हें कुछ समय की झूठी राहत देता है, लेकिन धीरे-धीरे वही राहत मौत का रास्ता बन जाती है।
सोशल मीडिया और ग्लैमर का जाल
फिल्मों, वेब सीरीज और सोशल मीडिया में नशे को ‘स्टाइल’ और ‘स्वैग’ के रूप में दिखाया जा रहा है। युवा इसे आधुनिकता समझ बैठते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि नशा न तो स्टाइल है, न ताकत—यह सबसे बड़ी कमजोरी है।
कम उम्र में नशे की शुरुआत
सबसे डराने वाली बात यह है कि आज नशे की शुरुआत 13–14 वर्ष की उम्र से होने लगी है। यह वह उम्र है जब जीवन की दिशा तय होती है, लेकिन नशा उस दिशा को अंधकार में बदल देता है। आज के समय में युवतियाँ भी पीछे नहीं है।



