17 जुलाई 1857: बसौद के अमर शहीदों को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि

बागपत। महाक्रांति ग्राम बसौद के 168वें शहादत दिवस पर युवा चेतना मंच समिति के सदस्यों ने 1857 की बलिदानी गाथा को स्मरण करते हुए गाँव के वीर सपूतों को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए।
यह दिन न केवल इतिहास का एक पन्ना है, बल्कि उन अदम्य साहस और बलिदान की जीवंत स्मृति है, जिसने भारत की आज़ादी की नींव रखी।
मंच के महासचिव एडवोकेट समीर अहमद ने बताया कि 17 जुलाई 1857 को गाँव की जामा मस्जिद—जो उस समय क्रांतिकारियों का मुख्यालय हुआ करती थी—पर अंग्रेजों ने हमला बोला। दो चरणों में चले इस भीषण संघर्ष में लगभग पूरा गांव शहीद हो गया।
बाबा शाहमल सिंह के नेतृत्व में लड़ रही बसौद की जनता ने अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों का सामना किया। जब अंग्रेजों को पता चला कि बाबा शाहमल मस्जिद में ठहरे हैं, तो गौरी पलटन ने बसौद को घेर लिया। लेकिन ग्रामीणों ने अपनी जानें गंवा कर बाबा शाहमल को सुरक्षित बाहर निकाल दिया।
शाम होते-होते, 15 ग्रामीणों को अंग्रेजों ने गाँव के बरगद के पेड़ पर फाँसी दे दी, और गाँव को आग के हवाले कर दिया। इतना रक्तपात हुआ कि गाँव के तालाब का पानी भी लाल हो गया, जो आज भी “खूनी तालाब” के नाम से जाना जाता है।
बसौद की मिट्टी आज भी उन शहीदों के रक्त की सौगंध खाए बैठी है, जिनके बलिदान से यह ज़मीन आज़ाद भारत की गवाह बनी।
मंच के संस्थापक मास्टर सत्तार अहमद ने बताया कि इस वर्ष कांवड़ यात्रा के कारण ग्राम-स्तरीय कार्यक्रम स्थगित किया गया, लेकिन कार्यालय पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में डॉ. तसलीम और मास्टर आदिल हुसैन के नेतृत्व में मंच के सदस्यों ने दो मिनट का मौन रखकर वीरों को नमन किया।
ज्यादातर ग्रामीणों ने वर्चुअल माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित की, लेकिन उनकी आँखों में आज भी वही आक्रोश, वही गर्व और वही कृतज्ञता साफ़ झलक रही थी।
इस अवसर पर डॉ. तसलीम, उपाध्यक्ष आदिल हुसैन, मुबारिक, राशिद, युसुफ, सुभान, आफताब, हर्ष, अर्श, आरिस आदि मौजूद रहे।
बसौद के अमर सपूतों की शहादत केवल इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा है।



