लोनी विधायक ने भी सूचना विभाग को लिखा पत्र
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : लोनी में इन दिनों सड़कों के गड्ढे भले ही जस के तस हों और विकास कार्य कछुआ चाल में ध्यानमग्न बैठे हों, मगर एक खोज अभियान पूरे वेग से लोनी में दौड़ रहा है“असली पत्रकार की तलाश।” फर्क बस इतना है कि यह अभियान किसी सरकारी टेंडर से नहीं, बल्कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की विद्वान लोगों से संचालित हो रहा है।
हर व्हाट्सएप ग्रुप में बहस उफान पर है। सवाल वही कौन असली? कौन फर्जी? और कौन सिर्फ गाड़ी पर “PRESS” लिखवाकर लोकतंत्र का दूर का रिश्तेदार बना बैठा है? चाय की दुकानों से लेकर फेसबुक की दीवारों तक एक ही जिज्ञासा तैर रही है“भाई साहब, असली पत्रकार दिखा क्या?” मानो वन विभाग ने किसी लुप्तप्राय प्रजाति का पोस्टर जारी कर दिया हो“देखते ही सूचना दें।”
दिलचस्प बात यह है कि जो लोग कल तक पत्रकारों को देखकर रास्ता बदल लेते थे, वही आज मीडिया के मानक तय कर रहे हैं। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ने बिना प्रवेश परीक्षा के सबको मीडिया विश्लेषक बना दिया है। हर कोई अपने-अपने नाप का पैमाना लेकर घूम रहा है—जो हमारी तारीफ करे, वही असली। जो सवाल पूछे, वह संदिग्ध। और जो ज्यादा पूछे, वह तो “विशेष निगरानी” योग्य।
असल और फर्जी की यह गुत्थी यूं ही नहीं उलझी। वर्षों से कुछ कथित पत्रकारों ने पेशे को इतना हल्का बना दिया कि अब हर प्रेस कार्ड पहले शक की नजर से देखा जाता है, भरोसा बाद में किया जाता है। गाड़ी पर “PRESS” लिखवाकर ट्रैफिक नियमों को सुझाव मानने वाले और हर कार्यक्रम में सेल्फी लेकर खुद को मीडिया का स्तंभ घोषित करने वाले भी कम नहीं। ऐसे में आम आदमी के लिए असली पत्रकार पहचानना उतना ही कठिन हो गया है जितना सरकारी फाइल में गति ढूंढना।
विडंबना देखिए—जब कोई पत्रकार सचमुच ईमानदारी से सवाल उठाता है, तो उसे ऐसे खोजा जाता है जैसे कोई अलार्म बज गया हो—“देखो-देखो, यही है वो जो ज्यादा पूछता है!” मानो सवाल पूछना लोकतंत्र में अपराध की श्रेणी में आ गया हो। कुछ हलकों में तो फुसफुसाहट यह भी है—“आजकल असली पत्रकार बहुत एक्टिव हो गए हैं, इनका कुछ करना पड़ेगा।”
इसी बीच लोनी विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने जिला सूचना अधिकारी व जनसंपर्क अधिकारी, गाजियाबाद को पत्र लिखकर लोनी में पंजीकृत पत्रकारों की सूची मांगी है और फर्जी पत्रकारों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही उन्होंने क्षेत्र में पत्रकारों की बढ़ती संख्या को “असामान्य” बताया है। बस फिर क्या था लोनी में विकास से ज्यादा चर्चा अब पत्रकारों की गिनती पर है। हर गली में गणना जारी है, मानो जनगणना का नया कॉलम खुल गया हो—“आप असली हैं या संभावित?”
पत्रकार समूहों में हलचल है। कुछ लोग अपने प्रेस कार्ड की धूल झाड़ रहे हैं, कुछ पुराने कवरेज की तस्वीरें साझा कर रहे हैं, तो कुछ व्हाट्सएप डीपी में “सत्य के साथ” लिखकर नैतिकता की वैक्सीन लगवा चुके हैं।
व्यंग्य यही है कि फर्जी पत्रकारों की पहचान पर जितनी चिंता दिखती है, उससे कहीं ज्यादा चिंता असली पत्रकारों की सक्रियता पर है। जिनकी कलम बिकाऊ नहीं, वे ज्यादा खटकते हैं। और जो हर मंच पर मुस्कुराकर माइक थाम लें, वे “समझदार” घोषित कर दिए जाते हैं।
लोनी की जनता अब धीरे-धीरे समझने लगी है कि पत्रकारिता और प्रेस कार्ड में उतना ही अंतर है जितना जिम्मेदारी और सुविधा में। असली पत्रकार वही है जो सत्ता से सवाल करे, समाज को सच दिखाए और निजी लाभ के बजाय जनहित को प्राथमिकता दे। बाकी तो उपाधि के सहारे प्रतिष्ठा की दुकान सजाए बैठे हैं।
अब देखना यह है कि यह खोज अभियान लोकतंत्र को मजबूत करेगा या व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का एक और शोध प्रोजेक्ट बनकर रह जाएगा। फिलहाल लोनी में विकास कार्यों से ज्यादा तेजी “असली पत्रकार” की तलाश में दिख रही है और लोकतंत्र चुपचाप यह तमाशा देख रहा

