
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
लोनी गाजियाबाद : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सख्त निर्देशों के बावजूद यमुना नदी में अवैध रेत खनन का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। न्यायालय द्वारा एफआईआर दर्ज करने, खनन पर रोक लगाने और संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश के बाद भी पचायरा गांव के यमुना खादर क्षेत्र में खुलेआम जेसीबी व अन्य मशीनों से रेत निकासी 6 फरवरी की रात में भी जारी रही । कोर्ट के आदेश के वावजूद भी खनन कार्य पर रोक लगाने में असमर्थ प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
मामला मद संख्या 6 के तहत 29 जनवरी 2026 को बिट्टू नामक आवेदक की शिकायत पर सुनवाई के दौरान सामने आया। न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी एवं विशेष सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की धारा 14, 15 व 18 के अंतर्गत दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रतिवादी संख्या 8 को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति निरस्त करने, अवैध खनन पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाने और नदी तल में यांत्रिक/अर्ध-यांत्रिक मशीनों के प्रयोग पर रोक लगाने की मांग को गंभीर माना।
रात में जेसीबी से खनन की पुष्टि
सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण ने पाया कि 2 जनवरी 2026 को यमुना की धारा से रात के समय जेसीबी मशीन द्वारा अवैध रेत खनन किया गया, जो पूर्णतः प्रतिबंधित है। साथ ही पुलिस व खनन विभाग पर तथ्यों को दबाने और विधिसम्मत कार्रवाई न करने के आरोप भी सामने आए।
न्यायालय के निर्देश
NGT ने आदेश दिए कि संबंधित थाना प्रभारी तत्काल एफआईआर दर्ज करे,जब्त वाहनों को अगली सुनवाई तक अभिरक्षा में रखा जाए,
प्रतिवादी संख्या 8 को आगे किसी भी प्रकार का खनन न करने दिया जाए,संबंधित अधिकारी अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है।
आदेश के बाद भी नहीं थमा खनन कार्य
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कोर्ट के आदेशों के बावजूद पचायरा में दिन-रात रेत निकासी जारी है 6 फरवरी की रात को भी रेत खनन कार्य जारी था। भारी मशीनों से नदी का सीना चीरकर रेत निकाली जा रही है। शिकायत करने पर भी पुलिस व खनन विभाग के अधिकारी अनभिज्ञता जताकर कार्यवाही से बच रहे हैं।
मिलीभगत की आशंका
खनन संचालकों के बेखौफ रवैये से ग्रामीणों में चर्चा है कि उन्हें विभागीय या राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। न्यायालय के आदेशों के बावजूद कार्यवाही न होना प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
पर्यावरण पर खतरा ग्रामीणों की चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि अनियंत्रित रेत खनन से नदी की धारा कमजोर होती है, भूजल स्तर गिरता है और तटों का कटाव बढ़ता है, जिससे आसपास के गांवों पर भी खतरा मंडरा सकता है।
अब सबकी नजर 18 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर है, जहां उम्मीद की जा रही है कि न्यायाधिकरण इस मामले में और कड़ा रुख अपनाएगा।

