ललितपुर
दुनियादारी से नाता तोड़कर रब से लौ लगाने का नाम है एतिकाफ : मुफ्ती नौशाद जमाली
नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
ललितपुर। रमजान-उल-मुबारक का मुकद्दस महीना अपने आखिरी पड़ाव की ओर है। इस बरकत वाले महीने के अंतिम दस दिन (अशरे) में की जाने वाली सबसे अहम इबादतों में से एक एतिकाफ है। सदनशाह मस्जिद के पेश इमाम, मुफ्ती नौशाद जमाली ने एतिकाफ की अहमियत और इसकी फजीलत पर रोशनी डालते हुए इसे रूहानी तरक्की का बेहतरीन जरिया बताया है।एतिकाफ का समय बीसवां रोजा इफ्तार के बाद शुरू होता है और ईद के चांद दिखने तक रहेगा।
एतिकाफ, रूहानी सुकुन का मरकज
मुफ्ती नौशाद जमाली ने बताया कि एतिकाफ एक ऐसी बाबरकत इबादत है, जिसमें बंदा दुनिया की तमाम मसरूफियतों, कारोबार और शोर-शराबे से अलग होकर खुद को अल्लाह की इबादत के लिए वक्फ (समर्पित) कर देता है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मस्जिद के एक कोने में बैठने का नाम नहीं, बल्कि अपने दिल को खुदा की याद से आबाद करने और गुनाहों से तौबा करने का सुनहरा मौका है।
एतिकाफ के अहम रूहानी फायदे
मुफ्ती साहब ने एतिकाफ की फजीलत बयान करते हुए इसके पांच मुख्य फायदों का जिक्र करते हुए बताया किे दुनियावी उलझनों से दूर होकर खुदा की इबादत में मशगूल रहने से दिल को बेपनाह सुकून मिलता है। एकांत में इबादत करने से अल्लाह पर भरोसा और यकीन और ज्यादा पुख्ता होता है। हर वक्त इबादत की हालत में रहने से बंदा अल्लाह के बेहद करीब होता है, जिससे दुआओं के मंजूर होने के मौके बढ़ जाता है। एतिकाफ के दौरान कलाम-ए-इलाही की तिलावत और उसे समझने का भरपूर वक्त मिलता है। यह इबादत इंसान के अंदर एक ऐसी रूहानी कैफियत पैदा करती है, जो उसकी पूरी जिंदगी बदल सकती है।
वक्त की अहमियत पर जोर
मुफ्ती नौशाद जमाली ने समाज को झकझोरते हुए एक अहम सवाल भी किया। उन्होंने कहा कि आज हमारे पास मोबाइल, कारोबार, दोस्तों और सैर-सपाटे के लिए घंटों वक्त है, लेकिन अफसोस की बात है कि हम अपने खालिक (बनाने वाले) के लिए चंद दिन नहीं निकाल पाते। उन्होंने अपील की कि रमजान के इस आखिरी अशरे की कद्र करें और सुन्नत-ए-मुअक्कदा के मुताबिक एतिकाफ के जरिए अल्लाह की रजा हासिल करने की कोशिश करें।

