
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली : क्या बंधा कोल ब्लॉक में ग्रामीणों के हकों को चंद रुपयों और रसूख की खातिर बेच दिया गया है? क्या कलेक्टर को सौंपा गया 27 सूत्रीय मांग पत्र और पुतला दहन की चेतावनियां सिर्फ ‘सेटिंग’ करने का एक जरिया थीं? बंधा के जंगलों से उठ रही आक्रोश की चिंगारी अब उस कथित ‘गुप्त समझौते’ की ओर इशारा कर रही है, जिसने हजारों ग्रामीणों और आदिवासियों के भविष्य को अंधेरे में धकेल दिया है।
आंदोलन की हुंकार या ‘मैनेजमेंट’ का ड्रामा?
चंद दिनों पहले तक जो नेतृत्व पुतला दहन और आमरण अनशन की कसमें खा रहा था, वह आज EMIL (बिरला कंपनी) के काम शुरू होने पर खामोश क्यों है? ग्रामीण चीख-चीख कर कह रहे हैं कि ‘अंदरुनी सेटिंग’ के तहत आंदोलन की धार कुंद कर दी गई और कंपनी को पिछले दरवाजे से काम शुरू करने की अनुमति दे दी गई।
कोर्ट के आदेश की धज्जियां, प्रशासन की चुप्पी संदिग्ध
जबलपुर हाईकोर्ट के स्थगन आदेश (Stay Order) के बावजूद बंधा के जंगलों में कुल्हाड़ियां चल रही हैं। इसे क्या कहा जाए?
न्यायालय की अवमानना: क्या कंपनी खुद को देश के कानून से ऊपर समझती है?
प्रशासनिक मिलीभगत: वन विभाग और जिला प्रशासन की नाक के नीचे बिना विस्थापन और बिना सही मुआवजे के काम कैसे शुरू हो गया?
फर्जी मुकदमों का जाल: ग्रामीणों को डराने के लिए पुलिस और वन विभाग का इस्तेमाल कर जो फर्जी मुकदमे लादे गए, उन पर आंदोलनकारी नेता अब मौन क्यों हैं?
देवेंद्र ‘दरोगा’ पाठक का ‘भूमिपूजन’ और सुलगते सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि जहां एक तरफ लोग बेघर हो रहे हैं, वहीं देवेंद्र दरोगा पाठक द्वारा जंगल की भूमि पर ‘विधिवत भूमिपूजन’ कर काम शुरू करवाना जले पर नमक छिड़कने जैसा है।
सवाल यह है: क्या यह भूमिपूजन ग्रामीणों की सहमति से हुआ या यह कंपनी के साथ हुए किसी ‘अपवित्र गठबंधन’ का परिणाम है?
सवाल यह है: उन हजारों मकानों का क्या, जिन्हें मुआवजे की लिस्ट से बाहर कर दिया गया?
सवाल यह है: आदिवासी महिलाओं के साथ हुई अभद्रता का हिसाब कौन देगा?
ग्रामीणों के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात!
बंधा कोल ब्लॉक का विवाद अब केवल मुआवजे की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘अपनों के हाथों ठगे जाने’ की कहानी बन चुका है। ग्रामीण खुद को असहाय और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आंदोलन की आड़ में जो लोग कंपनी के दलाल बनकर उभरे हैं, जनता उन्हें पहचान चुकी है।
चेतावनी: अगर विस्थापन की प्रक्रिया पूरी होने और 27 सूत्रीय मांगों के समाधान से पहले बलपूर्वक काम कराया गया, तो यह ‘शांत सिंगरौली’ के लिए बड़े जन-आक्रोश का कारण बनेगा। प्रशासन और कंपनी याद रखे, आदिवासियों की जमीन और उनके हक पर डकैती डालकर कोई भी प्रोजेक्ट लंबे समय तक नहीं चल सकता।
साहब! कागज पर ‘भूमिपूजन’ हो सकता है, लेकिन जमीन पर ग्रामीणों का लहू और आंसू गिरे हैं—इसका हिसाब तो देना ही होगा!



