
तेल, खाद और दवाओं के दाम बढ़ने की आशंका; खाड़ी देशों से आने वाले धन और एमएसएमई क्षेत्र पर भी पड़ेगा बुरा असर
नई दिल्ली : भारत अपनी 90% एलपीजी और 40% कच्चा तेल पश्चिम एशिया से आयात करता है। क्षेत्र में जारी तनाव से देश की ऊर्जा आपूर्ति और बजट पर सीधा असर पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (वठऊढ) की एक ताजा रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव बढ़ने की स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को लेकर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारत में गरीबी की दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 प्रतिशत हो सकती है। इसका सीधा असर करीब 24,64,698 लोगों पर पड़ेगा, जो गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे। संकट के बाद देश में कुल गरीबों की संख्या बढ़कर 35.40 करोड़ होने का अनुमान लगाया गया है।
नौकरियों और प्रवासियों की कमाई पर संकट
खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय कामगार देश की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाते हैं। अक्टूबर 2024 तक के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 93.7 लाख भारतीय खाड़ी देशों (ॠउउ) में रह रहे हैं। ये लोग भारत आने वाले कुल प्रेषण का 38-40% हिस्सा भेजते हैं। संघर्ष के कारण वहां आर्थिक सुस्ती आने से इन प्रवासियों की कमाई कम होगी, जिससे भारत में उनके परिवारों की क्रय शक्ति घटेगी।
इसके अलावा, भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। रत्न-आभूषण, कपड़ा और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में कच्चे माल की कमी और निर्यात में देरी के कारण छंटनी या काम के घंटों में कटौती की नौबत आ सकती है।
महंगी हो सकती हैं दवाएं और इलाज -आम आदमी के स्वास्थ्य पर भी इस युद्ध का साया मंडरा रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण चिकित्सा उपकरणों के कच्चे माल की कीमतों में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि होने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक, थोक बाजार में दवाओं की कीमतें पहले ही 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, जो आने वाले समय में और भी बढ़ सकती हैं।
यूएनडीपी की क्षेत्रीय निदेशक कन्नी विग्नराजा ने सुझाव दिया है कि देशों को इस तरह के संकट से बचने के लिए अपनी ऊर्जा और खाद्य प्रणालियों में विविधता लाने और स्थानीय स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की आवश्यकता है।



