गाजियाबाद
लोनी की गोशाला में ‘कागज़ी करुणा’, ज़मीन पर बदहाली
शासनादेश धूल खा रहा, जिम्मेदारों ने ओढ़ी चुप्पी की चादर

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
लोनी, गाजियाबाद। लोनी नगर पालिका की गोशाला इन दिनों अव्यवस्थाओं की ऐसी मिसाल बन गई है, जहां समस्याएं खुलकर नजर आती हैं, लेकिन समाधान कहीं नहीं दिखता। शासनादेशों का पालन फाइलों तक सीमित है और ज़मीन पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि शिकायतों के अंबार के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मानो ‘मौन व्रत’ धारण किए बैठे हैं।
निरीक्षण से पहले ही ‘निरीक्षक’ गायब
वार्ड 41 के सभासद अंकुश जैन ‘मिक्कू’ की शिकायत पर मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. सुभाष पांडेय ने गोशाला का निरीक्षण तय किया। उम्मीद थी कि हालात सुधरेंगे, लेकिन यहां तो कहानी ही उलटी निकली। आरोप है कि शिकायतकर्ता के पहुंचने से पहले ही अधिकारी खुद मौके से खिसक लिए जैसे समस्या नहीं, उससे सामना करना ही असली चुनौती हो।
गौवंश के लिए पानी भी ‘दूषित सौगात’
गोशाला में स्वच्छ पानी की व्यवस्था तक नदारद है। पानी की हौद में जमी काई और पनपते कीटाणु साफ संकेत देते हैं कि सफाई केवल कागजों में हो रही है। चूने का इस्तेमाल नहीं, सफाई का कोई नियमित सिस्टम नहीं ,गौसेवा के नाम पर यह लापरवाही सीधे गौवशो के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है।
धूप में तपते पशु, छांव भी ‘विलासिता’
गर्मी के मौसम में भी लू से बचाव का कोई इंतजाम नहीं। गौवंश खुले आसमान के नीचे खड़े रहने को मजबूर हैं। ऐसा लगता है मानो छांव और ठंडक अब ‘सुविधा’ की श्रेणी में डाल दी गई हो, जरूरी जरूरत नहीं।
चारा गायब, भूख हाज़िर
निरीक्षण के दौरान शाम साढ़े चार बजे तक पशुओं को चारा नहीं दिया गया था। पौष्टिक आहार की बात तो दूर, सामान्य भोजन भी समय पर नहीं मिल रहा। नतीजा—कमजोर होते पशु और बढ़ती मौतें।
मृत गायें और मृतप्राय व्यवस्था
मौके पर दो गायें मृत अवस्था में पाई गईं। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे प्रबंधन की संवेदनहीनता का आईना है। सवाल उठता है क्या जिम्मेदारों के लिए यह भी सिर्फ एक ‘रूटीन मामला’ है?
रिकॉर्ड शून्य, जवाबदेही गायब
गोशाला में कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिला। न लॉगबुक, न चारा रजिस्टर, न पशुओं का विवरण। यहां तक कि अधिकारियों के नाम और संपर्क नंबर तक प्रदर्शित नहीं। सूचना बोर्ड भी गायब जैसे पारदर्शिता से ही दूरी बना ली गई हो।
शिकायतें जारी, कार्रवाई लापता
लगातार शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ऐसा लगता है कि जिम्मेदारी तय करने की बजाय मामले को टालने की परंपरा ही यहां की असली नीति बन चुकी है।
जनता का सवाल ,योजना या दिखावा?
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि अगर सरकार की प्राथमिकता वाली योजनाओं का यह हाल है, तो उनके उद्देश्य पर ही सवाल खड़े होते हैं। जब जिम्मेदार ही जिम्मेदारी से खुऐ भागें, तो व्यवस्था का ‘भगवान भरोसे’ होना तय है।
अब नजरें प्रशासन पर टिकी हैं






