
नई दिल्ली : कैबिनेट के फैसले की जानकारी सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को दी। सरकार का कहना है कि वेतन सीमा में यह वृद्धि बदलती आय, बढ़ते वेतन और औपचारिक रोजगार के विस्तार को ध्यान में रखते हुए की गई है।
इधर विपक्ष यूपीआई पर संभावित शुल्क को लेकर हो-हल्ला मचाता रह गया, उधर मोदी सरकार ने कर्मचारियों के हित में बड़ा फैसला कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा दायरे को बढ़ाने से जुड़ा महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए मासिक वेतन सीमा को 15 हजार रुपये से बढ़ाकर 25 हजार रुपये करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। मोदी सरकार का अनुमान है कि इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी अनिवार्य ईपीएफओ कवरेज के दायरे में आ जाएंगे।
कैबिनेट के फैसले की जानकारी सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को दी। सरकार का कहना है कि वेतन सीमा में यह वृद्धि बदलती आय, बढ़ते वेतन और औपचारिक रोजगार के विस्तार को ध्यान में रखते हुए की गई है। मौजूदा व्यवस्था में 15 हजार रुपये मासिक वेतन सीमा महत्वपूर्ण थी। अब इसे 25 हजार रुपये किए जाने से 15 हजार से 25 हजार रुपये तक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग वैधानिक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के दायरे में आएगा।
हम आपको बता दें कि वेतन सीमा लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। वर्ष 2004 से 2014 के बीच इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ था। सितंबर 2014 में इसे बढ़ाकर 15 हजार रुपये किया गया था। इसके बाद पिछले एक दशक में वेतन और आय के स्तर में लगातार वृद्धि हुई है। कई राज्यों और विभिन्न क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी भी मौजूदा 15 हजार रुपये की सीमा के करीब पहुंच चुकी है। ऐसे में सरकार ने नई सीमा को मौजूदा आर्थिक और रोजगार परिस्थितियों के अनुरूप बनाने का फैसला किया है।
इस बदलाव का सबसे सीधा असर उन कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिनका वेतन अब तक 15 हजार रुपये से अधिक होने के कारण अनिवार्य एढऋ व्यवस्था के दायरे में नहीं आता था। नई सीमा लागू होने के बाद पात्र कर्मचारियों को प्रॉविडेंट फंड बचत, कर्मचारी पेंशन योजना और कर्मचारी जमा लिंक्ड बीमा योजना जैसी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाओं तक पहुंच मिलेगी। हालांकि इन योजनाओं के लाभ संबंधित नियमों और पात्रता शर्तों के अनुसार ही मिलेंगे।
सरकार के मुताबिक, इस फैसले से औपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिलने की भी उम्मीद है। EPFO जैसी वैधानिक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ने के कारण कर्मचारियों को भविष्य की सेवानिवृत्ति सुरक्षा के साथ-साथ नौकरी बदलने की स्थिति में सामाजिक सुरक्षा लाभों की पोर्टेबिलिटी का फायदा मिलता है। सरकार का मानना है कि व्यापक कवरेज से कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी और नियोक्ताओं के स्तर पर भी कर्मचारी स्थिरता तथा रिटेंशन को बढ़ावा मिल सकता है।
हम आपको यह भी बता दें कि इस प्रस्ताव पर अंतर-मंत्रालयी स्तर पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया था। व्यय वित्त समिति ने भी 16 जून 2026 को हुई बैठक में इसकी सिफारिश की थी। संशोधित व्यवस्था के तहत सरकार का अनुमानित वार्षिक खर्च करीब 11,339 करोड़ रुपये होगा, जबकि मौजूदा व्यवस्था में लगभग 10,250 करोड़ रुपये का वार्षिक बजटीय समर्थन दिया जाता है। पांच वर्षों में कुल अनुमानित खर्च करीब 56,696 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, करीब 7.98 करोड़ सदस्य लगभग 7.68 लाख योगदान करने वाले प्रतिष्ठानों के माध्यम से योगदान कर रहे हैं। वहीं, कर्मचारी पेंशन योजना के तहत करीब 82 लाख पेंशनभोगियों को पेंशन लाभ मिल रहा है। नई वेतन सीमा के साथ सरकार का लक्ष्य सामाजिक सुरक्षा के इस नेटवर्क को और व्यापक बनाना है। देखा जाये तो इस फैसले को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब केंद्र सरकार रोजगार को अधिक औपचारिक बनाने और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने पर जोर दे रही है। हाल के वर्षों में से जुड़े कई सुधारों और कर्मचारी नामांकन अभियानों के जरिए भी ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों को औपचारिक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की गई है।
हम आपको यह भी बता दें कि सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि 17 सितम्बर 2026 को विश्वकर्मा दिवस पर यह योजना लागू कर दी जायेगी।



