लखन महतो आदेशपाल होने के बावजूद भी छात्र छात्राओं ने गुरुजी का मान दिया

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बोकारो। लखन महतो पिता स्व ऋतु महतो का जन्म नावाडीह प्रखंड अंतर्गत सदर गांव में 1 जनवरी 1946 को हुआ था।उनके पिता एक किसान थे। लखन महतो ने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद घर में ट्यूशन पढ़ाने लगे। क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। कुछ दिनों बाद नावाडीह थाना में कुछ महीने ड्यूटी किए। परंतु ये काम इन्हें नहीं भाया और इस काम को छोड़कर वह पुनः बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के साथ फोटो मढ़ने का काम शुरू किया। इस दौरान एक दिन नावाडीह के तत्कालीन मुखिया और मुंह बोले मामा भूषण महतो मिले और सलाह दी कि आप ट्यूशन पढ़ा ही रहे हैं, हमलोगों द्वारा चलाए जा रहे हाई स्कूल (तब उसका नाम जनता उच्च विद्यालय था) में आदेशपाल की आवश्यकता है। आप विद्यालय में आदेशपाल का काम करने के साथ बच्चों को ट्यूशन भी कर सकते हैं। इस तरह आपको आर्थिक मदद भी मिल सकती है। लखन महतो उनकी बात मानकर जनता उच्च विद्यालय नावाडीह में आदेशपाल का काम करने लगे।तब उन्हें मानदेय के रूप में 30 रुपए मिलते थे। भूषण महतो जी के भंडार में उक्त विद्यालय का संचालन होने के दौरान जब नये कमरों का निर्माण कार्य शुरू हुआ तो उन्होंने निर्माण कार्य में श्रमदान के रूप में सहयोग भी किया।1960 ई.में उक्त विद्यालय का नाम भूषण उच्च विद्यालय नावाडीह कर दिया गया।वहीं एक दशक बाद सन् 1971 ई में स्कूल को सरकारी मान्यता मिल गई । लखन महतो इस स्कूल में आदेशपाल की सेवा नियमित हो गई । उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन करने के साथ साथ घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम जारी रखा। इसलिए स्कूल में आदेशपाल की नौकरी करने के बावजूद भी सभी बच्चे उन्हें गुरुजी पुकारते रहे। प्राथमिक स्तरीय शिक्षा की अच्छी जानकारी व सुहृदयता के फलस्वरूप छात्र छात्राओं द्वारा गुरुजी के रूप में समाद्रित रहे। आज भी पूरे प्रखंड में लोग उन्हें गुरुजी कह कर पुकारते हैं। वहीं आजकल वह स्कूल प्रखंड स्तरीय आदर्श भूषण +2 उच्च विद्यालय नावाडीह के नाम से विख्यात है।



