
चिराग पासवान के बयान ने इस पूरे मामले का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। चिराग ने विपक्ष के आरोपों को सही ठहराने के बजाय मुद्दे की जड़ पर हाथ रखा है, यानी उन्होंने जनता के भरोसे की बात कही है। उनका तर्क है कि विपक्ष राजनीति करेगा, यह उसका काम है।
अब तक चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वालों में विपक्ष सबसे आगे था, लेकिन अब सत्ता पक्ष के भीतर से भी चुनाव आयोग को लेकर आवाज उठने लगी है। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू है। केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रमुख सहयोगी चिराग पासवान ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से साफ कहा है कि अगर चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं तो चुनाव आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनका कहना है कि आयोग को सफाई राहुल गांधी को नहीं, बल्कि देश की जनता को देनी चाहिए। राजनीतिकखबरें पढ़ें
हम आपको बता दें कि मामला इसलिए गरम है क्योंकि चुनाव आयोग के भीतर ही मतभेदों की खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में लिए जा रहे फैसलों और निदेर्शों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े कामकाज, प्रपत्रों में बदलाव, आंकड़ों और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दों को लेकर थीं।
अब यहां से कहानी विपक्ष बनाम चुनाव आयोग की सीधी लड़ाई से आगे निकल जाती है। विपक्ष पहले से आरोप लगा रहा है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल हैं। राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक कर दी है। कांग्रेस सहित विपक्षी दल संसद में भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में हैं।
उधर, सत्ता पक्ष की तरफ से भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया है। भाजपा ने कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय होना किसी संस्था के कामकाज का सामान्य हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें किसी चुनाव आयुक्त का प्रत्यक्ष या अनौपचारिक बयान नहीं है।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आपत्तियां किसी बहुसदस्यीय संस्था की सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
लेकिन चिराग पासवान के बयान ने इस पूरे मामले का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। चिराग ने विपक्ष के आरोपों को सही ठहराने के बजाय मुद्दे की जड़ पर हाथ रखा है, यानी उन्होंने जनता के भरोसे की बात कही है। उनका तर्क है कि विपक्ष राजनीति करेगा, यह उसका काम है, लेकिन अगर आम मतदाता ही चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह करने लगे तो यह गंभीर बात है। इसलिए चुनाव आयोग को मजबूती से अपना पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए।
देखा जाये तो राजनीति में यही वह मोड़ होता है जहां बात आरोप-प्रत्यारोप से निकलकर भरोसे के सवाल पर आ जाती है। चुनाव जीतने-हारने का फैसला जनता करती है, लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगें तो उसका असर किसी एक दल की राजनीति तक सीमित नहीं रहता। खासकर तब, जब आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की संख्या भी सामने आ चुकी हो और बाहर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा हो।
ऊपर से चुनाव आयोग की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रस्तावित युवा मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों के स्थगित होने की खबर भी आई है। आयोग ने इसे कार्यक्रमों की तारीखों में होने वाले सामान्य बदलाव से जोड़ा है, जबकि सूत्रों के मुताबिक ये कार्यक्रम अनिश्चितकाल के लिए टाल दिए गए हैं।
यानी फिलहाल सियासत की गेंद चुनाव आयोग के पाले में है। विपक्ष सवालों की बौछार कर रहा है, भाजपा उसका बचाव कर रही है, लेकिन अब सहयोगी दल की तरफ से भी यही कहा जा रहा है कि सवाल उठ रहे हैं तो जवाब साफ-साफ दिया जाए। यही इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। मामला अब सिर्फ यह नहीं रह गया कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है; असली सवाल यह है कि चुनावी व्यवस्था को लेकर जनता के मन में उठ रहे संदेहों का जवाब कौन और किस तरह देगा।



