बागपत
होटल में मिले बालिग युवक-युवती को थाने ले जाना: कानून, अधिकार और पुलिस की जवाबदेही
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
होटल में किसी युवक और युवती का साथ मिलना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। यदि दोनों बालिग हैं, अपनी इच्छा से होटल में ठहरे हैं और उनके खिलाफ किसी अपराध की शिकायत या अन्य कानूनी मामला नहीं है, तो महज इस आधार पर उन्हें अपराधी की तरह पेश करना गंभीर सवाल खड़े करता है।
आजकल कई स्थानों पर होटल में पुलिस की जांच या छापेमारी के दौरान युवक-युवतियों को पूछताछ के लिए थाने ले जाने की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस को हर बालिग युवक-युवती को केवल होटल में साथ मिलने के आधार पर अपने साथ ले जाने का अधिकार है?
भारतीय कानून में पुलिस को अपराध की जांच और संदिग्ध परिस्थितियों में पूछताछ करने के अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन पूछताछ की आवश्यकता और किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने अथवा गिरफ्तार करने के बीच अंतर है। यदि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में परिस्थितियों के अनुसार नोटिस देकर पुलिस के समक्ष उपस्थित होने की व्यवस्था भी है।
आधार कार्ड जमा होने के बावजूद सवाल क्यों?
होटल में प्रवेश के समय पहचान-पत्र लिए जाना होटल की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। यदि युवक और युवती दोनों बालिग हैं, उनकी पहचान स्पष्ट है और होटल में ठहरने में कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है, तो केवल उम्र या पहचान की जांच के नाम पर उन्हें अपराधी मान लेना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
यदि पुलिस को किसी अपराध की शिकायत मिली है, कोई व्यक्ति लापता है, जबरदस्ती या धोखाधड़ी का संदेह है अथवा किसी आपराधिक मामले से उनका संबंध सामने आता है, तो पुलिस निश्चित रूप से जांच कर सकती है। लेकिन जांच का आधार स्पष्ट होना और कार्रवाई कानून के अनुसार होना जरूरी है।
पुलिस थाने बुला सकती है, लेकिन तरीका भी महत्वपूर्ण है
किसी व्यक्ति से पूछताछ आवश्यक होने पर कानून में निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। किसी बालिग नागरिक को इस तरह होटल से उठाकर ले जाना कि वह समाज की नजर में अपराधी दिखाई दे, उसके सम्मान और प्रतिष्ठा से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन सकता है।
विशेष रूप से महिला के मामले में पुलिस को उसकी गरिमा और सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। किसी महिला को केवल इसलिए संदेह की नजर से देखना कि वह किसी पुरुष के साथ होटल में मिली, अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है।
अगर बालिगों को होटल से ही पकड़ना है तो होटल बनाने की अनुमति क्यों?
यहां एक बड़ा सवाल होटल व्यवस्था और प्रशासनिक अनुमति की पूरी प्रणाली पर भी खड़ा होता है।
यदि किसी होटल में बालिग युवक-युवती का आपसी सहमति से ठहरना ही संदेह का आधार बन जाए और पुलिस उन्हें होटल से थाने ले जाने लगे, तो फिर यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि ऐसे होटलों को व्यवसाय चलाने की अनुमति आखिर किस उद्देश्य से दी जाती है?
होटल कोई ऐसी जगह नहीं है जहां केवल परिवार के साथ आने वाले लोग ही ठहर सकते हैं। होटल व्यवसाय का मूल उद्देश्य ही लोगों को निर्धारित शुल्क पर रहने की सुविधा देना है। यदि कोई होटल कानूनी रूप से संचालित है, पहचान-पत्र लेकर कमरे उपलब्ध कराता है और वहां ठहरने वाले दोनों व्यक्ति बालिग हैं, तो केवल उनके साथ होने को अपराध मानना अलग विषय है; अपराध होने की वास्तविक परिस्थितियां अलग से स्थापित करनी होंगी।
हां, यदि होटल में देह व्यापार, मानव तस्करी, नाबालिगों का शोषण, नशीले पदार्थ, जबरदस्ती, धोखाधड़ी या कोई अन्य अपराध पाया जाता है, तो पुलिस को कानून के तहत कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। होटल का लाइसेंस या संचालन की अनुमति किसी अपराध के लिए सुरक्षा कवच नहीं है।
लेकिन दूसरी ओर, कानूनी होटल में ठहरे प्रत्येक बालिग व्यक्ति को केवल संदेह या सामाजिक धारणा के आधार पर अपराधी मान लेना भी कानून के शासन की भावना से मेल नहीं खाता।
सवाल पुलिस से भी और होटल व्यवस्था से भी
यहां सवाल पुलिस के अधिकारों का विरोध करने का नहीं, बल्कि अधिकार और जिम्मेदारी के संतुलन का है। पुलिस को अपराध रोकने और अपराध की जांच करने का पूरा अधिकार है, लेकिन आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना भी कानून-व्यवस्था का ही हिस्सा है।
यदि किसी होटल में वास्तव में अवैध गतिविधि चल रही है तो कार्रवाई होनी चाहिए। नाबालिग मिले, मानव तस्करी का मामला हो, नशीले पदार्थ मिले, जबरदस्ती या किसी अन्य अपराध की शिकायत हो तो पुलिस की कार्रवाई आवश्यक है।
लेकिन यदि दो बालिग लोग अपनी इच्छा से होटल में ठहरे हैं और उनके खिलाफ कोई अपराध सामने नहीं है, तो केवल उनके साथ होने को अपराध की तरह देखना उचित नहीं होगा।
होटल को अनुमति देना, होटल से टैक्स और शुल्क लेना, पहचान-पत्र लेकर कमरा उपलब्ध कराना और फिर वहां ठहरे प्रत्येक बालिग युवक-युवती को संदेह की नजर से देखना—इन सभी व्यवस्थाओं के बीच स्पष्ट कानूनी रेखा होना जरूरी है।
कानून का उद्देश्य अपराधी को बचाना नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिक की गरिमा, निजता और स्वतंत्रता की भी रक्षा करना है। पुलिस की कार्रवाई जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी यह पारदर्शिता भी है कि किसी नागरिक को आखिर किस कानूनी आधार पर रोका, पूछताछ की या थाने ले जाया गया।
आखिर सवाल सिर्फ एक युवक और युवती का नहीं है। सवाल यह है कि एक बालिग नागरिक को अपराधी समझने से पहले कानून क्या कहता है, होटल को संचालन की अनुमति देने वाली व्यवस्था की जिम्मेदारी क्या है और नागरिक की गरिमा की रक्षा कौन करेगा?

