देश में हर साल लाखों लोग लापता, महिलाओं और लड़कियों की संख्या चिंताजनक
आखिर कहां हो जाते हैं गायब?
परिवारों की उम्मीदें दम तोड़ने लगती हैं, वर्षों तक नहीं मिलता सुराग; पुलिस की जांच, मानव तस्करी की आशंका और सरकारी व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
देश में हर साल बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबरें सामने आती हैं। इनमें महिलाओं और लड़कियों की संख्या विशेष चिंता का विषय है। किसी घर की बेटी अचानक गायब हो जाए, किसी मां का पता न चले या कोई बच्ची स्कूल जाने के बाद वापस न लौटे, तो उस परिवार पर क्या बीतती होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। परिवार थानों के चक्कर काटता है, रिश्तेदारों से पूछताछ करता है, तस्वीरें लेकर तलाश करता है और हर अनजान फोन पर इस उम्मीद से जवाब देता है कि शायद अपने की कोई खबर मिल जाए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी कायम है—आखिर इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं और लड़कियां कहां चली जाती हैं, और उनमें से कई का वर्षों तक पता क्यों नहीं चलता?
महिलाओं और लड़कियों की गुमशुदगी के आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं
(NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में देश में लापता दर्ज महिलाओं की संख्या 4,97,393 और लड़कियों की संख्या 94,079 थी। यानी इन दोनों श्रेणियों को मिलाकर 5,91,472 महिलाएं और लड़कियां लापता दर्ज की गईं। यह एक वर्ष का ऐसा आंकड़ा है, जो समाज और व्यवस्था दोनों को गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर करता है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि लापता दर्ज होने का अर्थ यह नहीं कि सभी महिलाएं और लड़कियां अब तक नहीं मिली हैं। इनमें से कई का पता लगा लिया जाता है, जबकि कुछ के मामले अनसुलझे रह जाते हैं। इसलिए यह जानना भी उतना ही आवश्यक है कि कितनी महिलाएं और लड़कियां बाद में मिल गईं और कितनी का अब तक कोई सुराग नहीं मिला।
हर आंकड़े के पीछे किसी परिवार की पीड़ा छिपी है। किसी पिता की आंखें बेटी की राह देखती हैं, किसी बच्चे को अपनी मां की वापसी का इंतजार रहता है और किसी बहन को अपने भाई से आखिरी मुलाकात याद आती रहती है। ऐसे परिवारों के लिए गुमशुदगी महज पुलिस रिकॉर्ड की एक संख्या नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द बन सकती है।
आखिर कहां गायब हो जाती हैं महिलाएं और बच्चियां?
इस सवाल का एक ही जवाब नहीं हो सकता। कुछ महिलाएं और किशोरियां पारिवारिक विवाद, घरेलू हिंसा, मानसिक दबाव या निजी परिस्थितियों के कारण घर छोड़ सकती हैं। कुछ लोग रोजगार, शिक्षा या बेहतर जीवन की तलाश में दूसरे शहरों में पहुंच जाते हैं और परिवार से उनका संपर्क टूट जाता है। कई मामलों में अपहरण, बहला-फुसलाकर ले जाने, जबरन मजदूरी और मानव तस्करी जैसे अपराधों की आशंका भी गंभीरता से जांचने की जरूरत होती है।
लेकिन असली सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से घर छोड़कर भी गया है, तो क्या उसके परिवार को उसकी सुरक्षा की जानकारी मिल पाती है? और यदि किसी महिला या बच्ची के साथ अपराध हुआ है, तो उसे समय रहते बचाने के लिए व्यवस्था कितनी तेजी से काम करती है?
बिना जांच के हर गुमशुदगी को अपराध या मानव तस्करी से जोड़ना उचित नहीं है। लेकिन किसी भी गंभीर आशंका को नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है।
आधुनिक तकनीक के बावजूद सुराग क्यों नहीं मिलता?
आज देश में मोबाइल फोन, सीसीटीवी कैमरे, रेलवे स्टेशनों की निगरानी, डिजिटल रिकॉर्ड और राज्यों के बीच पुलिस समन्वय जैसे साधन उपलब्ध हैं। इसके बावजूद कुछ मामलों में लंबे समय तक कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाती। कहीं शुरुआती जांच में देरी होती है, कहीं पहचान संबंधी जानकारी अधूरी रहती है और कहीं व्यक्ति दूसरे राज्य या शहर में पहुंच जाता है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हर गुमशुदगी के मामले की नियमित समीक्षा होती है? क्या दूसरे राज्यों की पुलिस के साथ समय पर जानकारी साझा की जाती है? क्या वर्षों से अनसुलझे मामलों की फाइलें दोबारा खोली जाती हैं? यदि तकनीक और संसाधन उपलब्ध हैं, तो उनका अधिक प्रभावी इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता?
शिकायत दर्ज कर लेना ही पुलिस की जिम्मेदारी का अंत नहीं होना चाहिए। हर मामले में जांच की प्रगति और तलाश के प्रयासों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
मानव तस्करी की आशंका पर हो सख्त निगरानी
महिलाओं और बच्चियों की गुमशुदगी के मामलों में मानव तस्करी की आशंका वाले प्रकरणों की विशेष गंभीरता से जांच होनी चाहिए। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, रोजगार की तलाश में निकले लोगों और असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों को निशाना बनाए जाने की आशंका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
पुलिस को संदिग्ध संपर्कों, यात्रा के रास्तों और दूसरे जिलों व राज्यों से मिलने वाले सुरागों की जांच करनी चाहिए। जहां संगठित गिरोह की आशंका हो, वहां संबंधित एजेंसियों के बीच तुरंत समन्वय होना चाहिए। साथ ही, जांच के बिना किसी व्यक्ति या समूह को दोषी ठहराने से भी बचना चाहिए।
सरकार और पुलिस जवाब दें
केंद्र और राज्य सरकारों को गुमशुदगी के मामलों पर नियमित और पारदर्शी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। कितने लोग लापता हुए, कितने मिले और कितने अब भी लापता हैं—इन आंकड़ों को अलग-अलग स्पष्ट किया जाना चाहिए। महिलाओं और लड़कियों के पुराने मामलों की समीक्षा हो तथा लापरवाही मिलने पर जिम्मेदारी तय की जाए।
परिवारों को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जांच की प्रगति की जानकारी भी मिलनी चाहिए। पुलिस को पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारी और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
हर लापता व्यक्ति के पीछे एक परिवार इंतजार कर रहा है
किसी व्यक्ति का लापता होना केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि इंसानियत और सामाजिक जिम्मेदारी की कसौटी है। जब तक परिवार को अपने सदस्य की जानकारी नहीं मिलती, तब तक उसकी उम्मीद और चिंता दोनों बनी रहती हैं।
आखिर कब तक परिवार अपनों की तस्वीरें लेकर भटकते रहेंगे? कब तक मां-बाप अपनी बेटियों की राह देखते रहेंगे? और कब हर लापता व्यक्ति की तलाश को समयबद्ध, गंभीर और जवाबदेह बनाया जाएगा?
सरकार, पुलिस और समाज को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें किसी की गुमशुदगी महज एक आंकड़ा बनकर न रह जाए। हर मामले की गंभीरता से जांच हो, हर संभावित सुराग पर कार्रवाई हो और हर परिवार को यह भरोसा मिले कि उसके अपने को खोजने के प्रयास बीच रास्ते में नहीं रुकेंगे।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि लोग लापता कहां होते हैं—सवाल यह भी है कि उन्हें तलाशने की जिम्मेदारी कौन और कितनी गंभीरता से निभा रहा है।


