बेतुल

बैतूल 13 साल बाद खुला राममंदिर जमीन सौदे का सबसे बड़ा राज

200 करोड़ की भूमि की रजिस्ट्री शून्य कराने कोर्ट पहुंचा मामला

 शासन भी बना सहवादी, अब कोर्ट तय करेगा किसकी है 17 एकड़ भूमि
विधायक चंद्रशेखर देशमुख की एंट्री के बाद तेज हुई कार्रवाई
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो 
बैतूल। मुलताई जनमंच संगठन के 13 साल के संघर्ष, स्थानीय नागरिकों की शिकायतों और विधायक चंद्रशेखर देशमुख की सक्रियता के बाद श्रीराम मंदिर ट्रस्ट की करीब 200 करोड़ रुपये मूल्य की 17 एकड़ भूमि का मामला अब न्यायालय में निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। प्रशासन भी प्रकरण में सहवादी बन चुका है और विवादित रजिस्ट्री शून्य कराने की कानूनी प्रक्रिया शुरू हो गई है।
कार्यालय अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, मुलताई द्वारा अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता को भेजे गए पत्र में स्पष्ट रूप से श्रीराम मंदिर ट्रस्ट की विक्रय भूमि की रजिस्ट्री शून्य कराने के संबंध में कार्रवाई का उल्लेख किया गया है। दस्तावेजों के अनुसार आवेदक अनिल सोनी द्वारा वर्ष 2025 में प्रस्तुत आवेदन के आधार पर पुराने आदेशों और अभिलेखों को संलग्न कर विवादित रजिस्ट्री की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। मामले में कलेक्टर बैतूल के वर्ष 2013 के पत्र और अपर कलेक्टर द्वारा 2015 में पारित आदेशों का भी उल्लेख किया गया है, जिससे स्पष्ट है कि यह विवाद लंबे समय से प्रशासनिक स्तर पर मौजूद था।
सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न इस बात को लेकर खड़ा हुआ है कि जिस संस्था या सर्वराकार के नाम पर भूमि विक्रय किए गए, क्या उसे वैधानिक अधिकार प्राप्त थे या नहीं। मामले से जुड़े लोगों का दावा है कि यदि दस्तावेजों के अनुसार कोई वैध समिति या ट्रस्ट अस्तित्व में नहीं था और किसी अन्य संस्था का हवाला देकर रजिस्ट्रियां की गईं, तो पूरा मामला गंभीर कानूनी जांच के दायरे में आ सकता है।
इस पूरे विवाद को नया मोड़ तब मिला जब मुलताई विधायक चंद्रशेखर देशमुख ने सितंबर 2025 में एसडीएम को पत्र लिखकर मामले की सूक्ष्म जांच कराने और संयुक्त जांच दल गठित करने की मांग की। विधायक ने अपने पत्र में 1913 के बकनीसनामा से लेकर 1959-60 के विक्रय पत्रों, 2008 के धार्मिक न्यास विभाग के ज्ञापन, 2009 के असाधारण राजपत्र और 2012 तक के दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कहा था कि यह मामला केवल कानूनी नहीं जनआस्था से जुड़ा विषय है।
बताया जा रहा है कि यह भूमि मुख्य सड़क से लगी हुई अत्यंत महत्वपूर्ण संपत्ति है, जिसकी कीमत लगातार बढ़ती गई। स्थानीय नागरिकों और मुलताई जनमंच संगठन का आरोप है कि वर्षों पहले हुए भूमि विक्रय और रजिस्ट्रियों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई। जनमंच संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि 13 वर्षों के लगातार संघर्ष, दस्तावेज जुटाने और प्रशासनिक प्रयासों के बाद आखिरकार मामला न्यायालय तक पहुंच पाया है।
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यह मानी जा रही है कि यदि न्यायालय विवादित 17 एकड़ भूमि की रजिस्ट्री को शून्य घोषित करता है, तो उसी खसरे से जुड़ी पूर्व में हुई अन्य रजिस्ट्रियों की वैधानिक स्थिति पर भी प्रभाव पड़ सकता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी स्थिति में न्यायालय स्वामित्व, ट्रस्ट की वैधता, विक्रय अधिकार और पूर्व दस्तावेजों की प्रमाणिकता की गहन जांच कर सकता है।
फिलहाल व्यवहार न्यायालय में प्रकरण दर्ज हो चुका है और आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई मुलताई की सबसे चर्चित कानूनी लड़ाइयों में शामिल हो सकती है। शहर में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर  चर्चा है और लोगों की नजर अब न्यायालय के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई है।
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