गाजियाबाद
4 जुलाई: 1857 की क्रांति के नायक कोतवाल धनसिंह गुर्जर का बलिदान दिवस

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 में अनेक ज्ञात और अज्ञात वीरों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। उन्हीं महान क्रांतिकारियों में मेरठ के तत्कालीन कोतवाल धनसिंह गुर्जर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 4 जुलाई को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर उनके साहस, नेतृत्व और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।
कोतवाल धनसिंह गुर्जर का जन्म मेरठ जनपद के पांचली गांव में एक समृद्ध गुर्जर जमींदार परिवार में हुआ था। स्थानीय लोग उन्हें धुन्ना सिंह के नाम से भी जानते थे। वर्ष 1857 में वे मेरठ कोतवाली में कोतवाल के पद पर तैनात थे। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी इस्तेमाल किए जाने की खबर से भारतीय सैनिकों में व्यापक असंतोष था। 9 मई 1857 को इन कारतूसों का उपयोग करने से इनकार करने वाले सैनिकों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जिससे पूरे क्षेत्र में आक्रोश फैल गया।
बताया जाता है कि सैनिकों के अपमान से आहत धनसिंह गुर्जर ने आसपास के गांवों में संदेश भिजवाकर हजारों ग्रामीणों को 10 मई की रात मेरठ बुलाया। योजनाबद्ध तरीके से उन्होंने ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार पुलिसकर्मियों को कोतवाली के भीतर भेज दिया। इसके बाद देर रात क्रांतिकारियों और ग्रामीणों ने जेल तथा कोतवाली पर धावा बोल दिया। इस कार्रवाई में बड़ी संख्या में बंदी सैनिकों को मुक्त कराया गया और अंग्रेजी शासन के कई प्रतिष्ठानों को आग के हवाले कर दिया गया। इसके बाद क्रांतिकारी दिल्ली की ओर कूच कर गए, जहां बहादुर शाह जफर को प्रतीकात्मक रूप से भारत का शासक घोषित किया गया।
हालांकि अंग्रेजी शासन ने कुछ ही समय में सैन्य शक्ति के बल पर विद्रोह को दबा दिया। बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके उत्तराधिकारियों की हत्या कर दी गई। मेरठ विद्रोह की जांच में कोतवाल धनसिंह गुर्जर को प्रमुख सूत्रधार माना गया। उन्हें गिरफ्तार कर उसी कोतवाली में बंद किया गया, जहां वे कभी कोतवाल थे। इसके बाद 4 जुलाई 1857 को मेरठ के एक सार्वजनिक चौराहे पर उन्हें फांसी दे दी गई।
धनसिंह गुर्जर की शहादत के बाद भी अंग्रेजों का दमन नहीं रुका। प्रतिशोध की भावना से अंग्रेजी सेना ने उनके पैतृक गांव पांचली पर हमला किया। समकालीन विवरणों के अनुसार इस अभियान में घुड़सवार, पैदल सैनिक और तोपखाना शामिल था। ग्रामीणों ने साहसपूर्वक प्रतिरोध किया, लेकिन भारी सैन्य बल के सामने टिक नहीं सके। इस संघर्ष में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और अनेक ग्रामीणों को गिरफ्तार कर फांसी दी गई। निकटवर्ती गगोल गांव के नौ स्वतंत्रता सेनानियों को भी दशहरे के दिन फांसी दी गई। स्थानीय मान्यता है कि तभी से वहां दशहरा नहीं मनाया जाता।
स्वतंत्रता के बाद कोतवाल धनसिंह गुर्जर के योगदान को विभिन्न स्तरों पर सम्मान दिया गया। मेरठ विश्वविद्यालय परिसर के एक सामुदायिक केंद्र का नाम उनके नाम पर रखा गया। वर्ष 2018 में मेरठ की ऐतिहासिक कोतवाली में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। उत्तर प्रदेश सरकार ने मेरठ स्थित पुलिस प्रशिक्षण अकादमी का नाम ‘शहीद धनसिंह गुर्जर कोतवाल पुलिस प्रशिक्षण अकादमी’ रखा। 11 मार्च 2023 को अकादमी परिसर में उनकी प्रतिमा के अनावरण समारोह में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित रहे।
हर वर्ष 4 जुलाई को मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में विभिन्न सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक संस्थाओं द्वारा कोतवाल धनसिंह गुर्जर को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। उनका जीवन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में जनभागीदारी, साहस और बलिदान का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

