नोटिस के बाद भी खामोशी.? वंदना हॉस्पिटल मामले में विभागीय कार्रवाई पर सवाल

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली l सिंगरौली जिले में निजी अस्पतालों के संचालन और नियामकीय मानकों के पालन को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। वैढ़न स्थित वंदना हॉस्पिटल को लेकर चर्चाएं हैं कि अस्पताल कथित रूप से आवासीय भवन में संचालित हो रहा है। इस संबंध में पूर्व में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय में शिकायत होने तथा अस्पताल को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी। हालांकि इसके बाद विभाग ने क्या कार्रवाई की, जांच में क्या तथ्य सामने आए और मामला किस निष्कर्ष तक पहुंचा, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। यही कारण है कि लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि शिकायत सही थी तो नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं हुई, और यदि शिकायत निराधार थी तो विभाग ने इसकी जानकारी सार्वजनिक कर भ्रम की स्थिति समाप्त क्यों नहीं की।
नियमों का पालन सभी के लिए समान होना चाहिए
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन छोटे दुकानदारों और आम नागरिकों पर नियमों के उल्लंघन के मामलों में तत्काल कार्रवाई करता है, लेकिन निजी अस्पतालों के मामलों में अक्सर जांच और कार्रवाई को लेकर पारदर्शिता दिखाई नहीं देती। यदि किसी भवन को आवासीय उपयोग की अनुमति प्राप्त है तो उसमें अस्पताल संचालन के लिए भवन उपयोग परिवर्तन, नगर निगम सहित संबंधित विभागों की स्वीकृतियां और अन्य वैधानिक अनुमतियां आवश्यक होती हैं। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित अस्पताल के पास सभी जरूरी अनुमति एवं प्रमाण-पत्र उपलब्ध हैं या नहीं।
मरीजों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
अस्पताल केवल इलाज का केंद्र नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण संस्थान है। यहां फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास, पार्किंग व्यवस्था, बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन और भवन सुरक्षा जैसे मानकों का पालन अनिवार्य होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई निजी अस्पतालों में पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से मरीजों और उनके परिजनों के वाहन सड़क पर खड़े रहते हैं, जिससे यातायात बाधित होता है। आपातकालीन परिस्थितियों में एम्बुलेंस या फायर ब्रिगेड की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका भी बनी रहती है। यदि ऐसा है तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।
नोटिस के बाद क्या हुई कार्रवाई?
सूत्रों के अनुसार, पूर्व में शिकायत मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित अस्पताल को नोटिस जारी किया था। लेकिन इसके बाद क्या निरीक्षण किया गया? क्या अस्पताल ने कथित कमियां दूर कर लीं? क्या जांच रिपोर्ट तैयार हुई? यदि हुई तो उसमें क्या निष्कर्ष निकला? इन सभी सवालों पर विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाने से पारदर्शिता बढ़ती है तथा आम लोगों के मन में उत्पन्न होने वाली शंकाएं भी समाप्त होती हैं।
क्या निगरानी केवल कागजों तक सीमित है?
स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी केवल अस्पतालों का पंजीयन या लाइसेंस जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि समय-समय पर निरीक्षण कर यह सुनिश्चित करना भी है कि सभी निर्धारित मानकों का पालन किया जा रहा है। भवन सुरक्षा, फायर एनओसी, बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन, पार्किंग व्यवस्था और मरीजों की सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा विभागीय दायित्व का हिस्सा है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि नियमित निरीक्षण किए जा रहे हैं तो उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती, और यदि निरीक्षण नहीं हो रहे हैं तो इसकी जवाबदेही किसकी है?
संयुक्त जांच की उठी मांग
सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने जिले के सभी निजी अस्पतालों की संयुक्त जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम, अग्निशमन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा अन्य संबंधित एजेंसियों की संयुक्त टीम गठित कर निजी अस्पतालों के भवन, लाइसेंस, फायर एनओसी, पार्किंग, बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन और अन्य वैधानिक मानकों की व्यापक जांच की जाए तथा उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि लोगों के बीच व्याप्त आशंकाओं का निष्पक्ष समाधान हो सके।
इस पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन तथा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. पुष्पराज सिंह से उनका पक्ष जानने के लिए फोन के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका क्योंकि फोन रिसीव नहीं किया गया। इसलिए उनका पक्ष समाचार में शामिल नहीं किया जा सका। यदि अस्पताल प्रबंधन या स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण प्राप्त होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।



